मौत का 'डंकी रूट'! जान, माल और इज्जत भी लुट जाए, बस कैसे भी अमेरिका पहुंच जाएं, ऐसा जोखिम भरा रास्ता क्यों चुनते हैं भारतीय?
इस विमान में सवार लोगों के लिए अमेरिका में रहने और बसने का सपना खत्म हो गया है। असल में कई लोग अमेरिका तक पहुंचने के लिए न सिर्फ कानूनी बल्की अवैध रास्ता भी अपनाते हैं, फिर चाहे उसमें जान का खतरा ही क्यों न हो। ये भारतीय अमेरिका जाने के लिए जो रास्ता अपनाते हैं, उसे आज की भाषा में 'डंकी रूट' कहा जाता है। लेकिन इस डंकी रूट को सही सलामत पार करना भी नसीब की ही बात है
मौत का 'डंकी रूट'! जान, माल और इज्जत भी लुट जाए, बस कैसे भी अमेरिका पहुंच जाएं
अमेरिका में अवैध तरीके से रह रहे भारतीयों को डिपोर्ट करने के मुद्दे पर गुरुवार को राज्यसभा में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि 'न तो ये वापसी नई है और न ही प्रक्रिया अवैध है।' बुधवार को US मिलिट्री प्लेन 100 से ज्यादा भारतियों को लेकर पंजाब के अमृतसर में लैंड हुआ। उनमें से 33-33 हरियाणा और गुजरात से, 30 पंजाब से, तीन-तीन महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से और दो चंडीगढ़ से हैं। यह कदम डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति का पद संभालने और अवैध अप्रवासियों पर कार्रवाई शुरू करने के बाद उठाया गया है।
इस विमान में सवार लोगों के लिए अमेरिका में रहने और बसने का सपना खत्म हो गया है। असल में कई लोग अमेरिका तक पहुंचने के लिए न सिर्फ कानूनी बल्की अवैध रास्ता भी अपनाते हैं, फिर चाहे उसमें जान का खतरा ही क्यों न हो।
ये भारतीय अमेरिका जाने के लिए जो रास्ता अपनाते हैं, उसे आज की भाषा में 'डंकी रूट' कहा जाता है। लेकिन इस डंकी रूट को सही सलामत पार करना भी नसीब की ही बात है।
अमेरिका जाने वाले भारतीय
आंकड़ों से पता चलता है कि आज तक, अमेरिका 7,25,000 अवैध भारतीय नागरिकों का घर है। और ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अमेरिकी सीमाओं पर जाने की उम्मीद में रास्ता खोजते हैं और खोज रहे हैं।
लेकिन एक बड़ा सवाल ये है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक अमेरिका क्यों जाना चाहते हैं? इनमें से ज्यादातर तो बेहतर आर्थिक मौकों की तलाश में वहां जाते हैं और मानते हैं कि अमेरिका में उन्हें एक बेहतर जीवन जीने को मिलेगा।
कई भारतीयों का कहना है कि उन्हें लगता है कि अगर वे अमेरिका के किसी बड़े शहर में पहुंच सकें, तो वे अपने लिए कोई अच्छा काम और बेहतर जीवन जी पाएंगे। रिपोर्ट्स की मानें, तो खालिस्तान आंदोलन पर नकेल कसने वाले भारतीय अधिकारियों की ओर से उत्पीड़न के डर से कुछ सिख भी वहां जाना चाहते हैं।
यही सब वे कारण हैं, जिन वजहों से भारतीय लोग अमेरिका जाने के लिए अपना सब कुछ जोखिम में डालने को तैयार हो जाते हैं। वाशिंगटन के थिंक टैंक, निस्कानन सेंटर की इमग्रेशन विश्लेषक स्नेहा पुरी का मानना है कि भारत के लोग सिर्फ बेहतर नौकरियों के लिए ही अमेरिका नहीं आते हैं, बल्कि इससे भी कुछ ज्यादा चाहते हैं।
उन्होंने BBC को बताया, "सभी के पीछे का कारण अलग होता है, लेकिन ज्यादातर लोग आर्थिक मौकों की तलाश में आते हैं। एक बड़ा पुश इससे भी मिलता है कि समाज में उनके परिवार का नाम होगा, जब उनके घर का कोई सदस्य अमेरिका में जाकर बसेगा।"
भारत के प्रवासी मेक्सिको से अमेरिका आने के बाद कैलिफोर्निया के जैकुम्बा हॉट स्प्रिंग्स में भीषण गर्मी में पानी शेयर करते हुए (FILE PHOTO- AP)
प्यू रिसर्च सेंटर के 2021 के अनुमान के अनुसार, अमेरिका में अवैध तरीक से घुसने वाले अप्रवासियों का तीसरा सबसे बड़ा ग्रुप भारतीय लोगों का ही होता है।
भारत टॉप 5 में अकेला देश है, जो लैटिन अमेरिका के बाहर का है। 2011 के बाद से अमेरिका में बिना किसी दस्तावेज के रहने वाले भारतीयों की संख्या में 70 प्रतिशत का उछाल आया है, जो दूसरे देशों की तुलना में काफी ज्यादा है।
US कस्टम्स और बॉर्डर सिक्योरिटी के आंकड़े बताते हैं कि 2020 और 2023 के बीच बिना दस्तावेज वाले भारतीय अप्रवासियों की संख्या सबसे तेजी से बढ़ी है।
'डंकी रूट' पर सब कुछ खतरे में डालना
अमेरिका जाने के लिए अनगिनत भारतीय डंकी रूट का इस्तेमाल करते हैं, जिसके जरिए अवैध तरीके से अमेरिका पहुंचने की कोशिश की जाती है, लेकिन इसकी कीमत कई लोगों को अपनी जान, माल और इज्जत तक देकर भी चुकानी पड़ती है। डंकी शब्द पंजाबी शब्द "डनकी" से लिया गया है, जिसका मतलब है एक जगह से दूसरे जगह पर कूदना।
चलिए जानते हैं कि ये डंकी रूट आखिर क्या है। इसका मतलब है कि जो लोग अमेरिका तक पहुंचना चाहते हैं, वो एक यात्रा करते हैं, जिसमें अलग-अलग देशों जैसे पनामा, कोस्टा रिका, अल साल्वाडोर और ग्वाटेमाला जैसे मध्य अमेरिकी देशों में कई पड़ाव को पार करना होता है। वहां से, ये लोग एजेंट और मानव तस्करों की मदद से पैदल ही अमेरिका में घुसने की उम्मीद करते हैं। चलिए इसे और डिटेल से समझते हैं।
डंकी रूट का पहला पड़ाव
इसकी शुरुआत किसी एजेंट के जरिए होती है, जो आपको सपनों की मंजिल, अमेरिका तक पहुंचाने का वादा करता है। बस किसी भी तरह अमेरिका तक पहुंचने के लिए लोगों को इन एजेंट्स को करीब 44 लाख से लेकर 87 लाख रुपए तक देने पड़ते हैं।
ऐसे ही एक तस्कर के हवाले से Sky News ने बताया, "मैं हर सीजन में लगभग 500 लोगों भेजता हूं, और एक साल में ऐसे तीन सीजन होते हैं।"
एक बार कॉन्ट्रैक्ट हो जाने के बाद, लैटिन अमेरिका में उतरने से पहले, उम्मीदवार को अनुकूल वीजा जरूरतों वाले देश में ले जाया जाता है- इक्वाडोर, बोलीविया या गुयाना जैसे देशों में। कुछ मामलों में, एजेंट दुबई से मेक्सिको के लिए डायरेक्ट वीजा की व्यवस्था करते हैं।
हालांकि, लैटिन अमेरिका के किसी भी देश तक पहुंचना पहला और असल में सबसे आसान कदम है। इसके बाद यहां से ये लोग खतरनाक जंगलों से होते हुए अमेरिका-मेक्सिको बॉर्डर तक की खतरनाक यात्रा शुरू करते हैं।
तस्करों का कहना है कि इस मुश्किल यात्रा में हर कोई जिंदा नहीं बच पाता। एक एजेंट ने Sky News को बताया कि सभी "अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते, क्योंकि 10 से 12 प्रतिशत लोग रास्ते में ही मर जाते हैं या पेमेंट न करने पर मार दिए जाते हैं।"
भारत के अप्रवासी युमा, एरिजोना में मेक्सिको से सीमा पार करने के बाद प्रोसेसिंग के लिए ले जाने के लिए US बॉर्डर पट्रोल बस में चढ़ने का इंतजार करते हुए (FILE PHOTO)
ऐसे ही एक भारतीय नागरिक के परिवार ने CNN को अपनी कहानी सुनाई। इस शख्स की यात्रा की शुरुआत दुबई के लिए पहली फ्लाइट से हुई और फिर अल्माटी, कजाकिस्तान तक गया। वहां से ये व्यक्ति तुर्की गया, जहां वह पनामा सिटी और फिर सैन साल्वाडोर के लिए फ्लाइट लेने से पहले 24 घंटे तक इस्तांबुल एयर पोर्ट पर ही रहा।
वहां, उसकी मुलाकात एक तस्कर से हुई और यात्रा के सबसे मुश्किल फेज: नॉर्थ, ग्वाटेमाला की ओर बढ़ने से पहले उसने अपना फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। परिवार को बाद में पता चला कि अल साल्वाडोर-ग्वाटेमाला बॉर्डर पर एक नदी तट पर अपराधियों ने उस व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी थी।
एक और भारतीय, जिसने पांच साल पहले इसी तरह की यात्रा की थी, उसके लिए भी ये किसी बुरे सपने से कम नहीं था। जालंधर के हरजिंदर सिंह ने Indian Express को बताया कि उन्हें भी कुछ ऐसा ही झेलना पड़ा, फर्क सिर्फ इतना है कि वह जिंदा बच गए।
अमेरिका में सेफ एंट्री का वादा करते हुए, सिंह जून 2019 में दुबई के लिए रवाना हुए, लेकिन जल्द ही असलियत उनके सामने आ गई।
वह याद करते हैं, "हमें एक पहाड़ और एक नदी को पार करने के लिए घोड़ों पर बिठाया गया था। कोलंबिया से, हम आठ घंटे की बस यात्रा के बाद कैली पहुंचे... पनामा जंगल के बीचों-बीच एक नाव लेने से पहले हम तटीय शहर टर्बो की ओर गए, जहां हमारे साथ 15 अफ्रीकी आप्रवासियों का एक ग्रुप भी था।"
हरजिंदर को पनामा जंगल के 105 Km लंबे हिस्से को पार करने में 10 दिन से ज्यादा समय लगा। उन्होंने बताया, "हमने कम से कम 40 शवों को पार किया, कुछ आधे खाये हुए और कुछ कंकाल... इस बात को पांच साल हो गए हैं, लेकिन मुझे अभी भी उस हिस्से को पार करने के बुरे सपने आते हैं। कई दिनों के बाद हमने सैनिकों को देखा। तब कुछ राहत भी थी और डर भी था। उन्होंने हमें एक कैंप में धकेल दिया, जहां मैं कई दिनों के बाद सोया।"
उन्होंने आगे बताया, "आखिरकार, हमें वेराक्रूज़ के एक कैंप में ले जाया गया... हमें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अमेरिकी सीमा अधिकारियों से बात कराई गई... हमने सोचा कि हम अमेरिका जाएंगे, लेकिन हमें वापस भारत भेज दिया गया।"
इस डंकी रूट को पार करने वाले कई भारतियों को बलात्कार तक का शिकार होना पड़ता है।
अमेरिका में घुसने के लिए मरने को भी तैयार!
कई लोगों के लिए, अमेरिका में रहने की इच्छा खतरों से भी बढ़कर है, यहां तक कि उन्हें मौत की भी कोई परवाह नहीं। इसका दर्दनाक उदाहरण हैं जगदीश पटेल, उनकी पत्नी और उनके दो छोटे बच्चों की मौत। ये गुजरात का एक परिवार था, जो 2022 में US-कनाडा बॉर्डर से कुछ ही मीटर की दूरी पर ही ठंड में अपनी जान गंवा बैठे।
गुजरात के डिंगुचा के रहने वाले पटेल परिवार ने अमेरिका में बेहतर जीवन के बारे में सोचा और अपनी जानलेवा यात्रा शुरू की। वे बड़े-बड़े खेतों से गुजरे और भारी बर्फबारी के बीच, अंधेरे में नेविगेट करते हुए चले और उन्हें उम्मीद थी कि कोई तस्कर उन्हें पिक करेगा।
हालांकि, उनके तय पिकअप से एक दिन पहले ही पटेल परिवार मौत के आगोश में जा चुका था। अमेरिकी अधिकारियों को उनके तीन साल के बेटे के शरीर के आसपास जगदीश की जमे हुए हाथ मिले।
पटेल परिवार जैसा ये कोई पहला मामला नहीं थी। अप्रैल 2022 में, छह भारतीय नागरिकों को कनाडा में बर्फीली सेंट रेजिस नदी से बचाया गया था।
डंकी रूट को चुनने वाले ये लोग खतरों का परवाह किए बिना, हजारों भारतीय इन्हें चुनते हैं। वो भी तब जब उन्हें ये मालूम है कि वे अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच भी पाएंगे या नहीं।