UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल हुआ कर्नाटक का होयसल मंदिर, जानिए क्या है खासियत

18 सितंबर को जारी की गई यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट 2022-23 में होयसल मंदिरों का नाम शामिल किया गया है। होयसल मंदिरों का सारा डिजाइन होयसल स्टाइल से प्रेरित है जो मध्य भारत के भूमिजा स्टाइल, उत्तर भारत के नागर स्टाइल और कर्नाता द्रविड़ स्टाइल का मिश्रण है। इस स्टाइल के मंदिर बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में बनाए गए। इसके शुरुआती शिल्पकार के तौर पर जकनचारी का नाम सामने आता है।

अपडेटेड Sep 23, 2023 पर 10:01 AM
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Hoysalesvara मंदिर दोरासमुद्रा टैंक के किनारे पर बना है।

अपनी शादी के तुरंत बाद एक शिल्पकार अमरशिल्पी जकनचारी ने अपना घर छोड़ दिया और कर्नाटक के तुमकुर में नए आइडियाज के साथ जा पहुंचे। अमरशिल्पी घर से नौ किलोमीटर दूर जाकर कल्याणी, चालुक्य और होयसल जैसे मंदिरों पर काम करने लगे। वो अपने काम के प्रति इतना समर्पित थे कि अपनी पत्नी और बेटे के बारे में भी भूल गए। यहां तक की अपने बेटे के जन्म के समय भी वो परिवार के साथ उपस्थित नहीं थे। जकनचारी ने बेलूर के चेन्नाकेशव मंदि, हेलिबिड का होयसलेश्वर मंदिर और सोमनाथपुरा के केशव मंदिर पर काम किया।

वर्ल्ड हेरिटेज में मंदिर को किया शामिल

18 सितंबर को इन तीनों मंदिरों को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट 2022-23 में शामिल किया गया। अब ये भारत की इस लिस्ट में मौजूद 42वीं साइट बन गई है। ये मंदिर 2014 और 2019 की जारी होने वाली लिस्ट में थे लेकिन इन्हें यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज की फाइनल लिस्ट में शामिल नहीं किया गया था। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज वेबसाइट पर इन पवित्र जगहों को दक्षिण भारत के 12वीं और 13वीं शताब्दी के होयसल स्टाइल मंदिरों का रिप्रेजेंटेटिव बताया गया है।

होयसल स्टाइल एक पवित्र वास्तुकला

होयसल स्टाइल मध्य भारत के भूमिजा स्टाइल, उत्तर भारत के नागर स्टाइल और कर्नाता द्रविड़ स्टाइल से जोड़कर बना है। होयसल मंदिरों की वास्तुकला अलग-अलग मंदिरों को तैयार किए जाने में लगे ज्ञान और संस्कृति को दर्शाती है। तरह-तरह के मंदिरों को बनाने में इस्तेमाल की गई तकनीक एक ही तरह के मंदिर में दिखाई गई है।

इन मंदिरों का परिक्रमा क्षेत्र सितारे की आकृति में रहता है। शुरुआत में होयसल मंदिरों को ग्रेनाइट से बनाया गया था और इनमें ज्यादा बारीकी से काम नहीं किया गया था। होयसल साम्राज्य को बाद में बेलूर, हेलिबिड और सोमनाथपुरा के मंदिरों में बखूबी दर्शाया गया। मंदिर में सोपस्टोन की मदद से कलाकारी की गई है। सोपस्टोन काफी मुलायम पत्थर होता है जिस पर डिजाइन उकेरना काफी आसान होता है। यही वजह रही कि शिल्पकार आसानी से इस पत्थर पर कपड़ों, गहनों और हेयरस्टाइल जैसी चीजों को डिटेल में आकार दे पाए। होयसल शिल्पकार मल्लोजा, मनियोजा, दासोजा और मलितम्मा होयसल काल के खत्म होने के बाद बेहद फेमस हुए। वो इन जगहों पर अपनी गहरी छाप छोड़ने में भी कामयाब रहे।


UNESCO की लिस्ट में शामिल होने का क्या मतलब है?

यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल होने के बाद इन मंदिरों के ऊपर खास ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ ही उस क्षेत्र में जितने भी होयसल मंदिर हैं उन्हें भी संरक्षण में मदद दी जा सकेगी। ब्रांड स्ट्रैटजी एक्सपर्ट हरीष बिजनूर ने कहा कि इस टैग को भले ही समय लग गया हो लेकिन इसके मिलने के बाद यात्री जरूर इस कला को देखने आएंगे। इससे टूरिज्म रेवेन्यू के बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है। एक यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज में लिस्टेड साइट को कानूनी तौर पर सुरक्षा प्रदान की जाती है और कंजर्वेशन के लिए फंड भी दिए जाते हैं।

शिल्पकार जकनाचारी को क्या हुआ?

जकनचारी की कहानी अपने आप में काफी खास है। जब जकनचारी का बेटा डंकनाचारी बड़ा हुआ तो वो अपने पिता की तलाश में निकल पड़ा। जब वो बेलूर पहुंचा तो उसे वहां बतौर शिल्पकार उसे काम मिलने लगा। इस बात से अनजान कि वो उसके पिता की ही बनाई कला है, एक दिन उसने किसी काम में एक गलती खोज निकाली। इससे जकनचारी को बहुत गुस्सा आया कि किसी ने उसके किए काम में गलती को खोजा है। गलत साबित होने पर उन्होंने अपना दायां हाथ ही काट दिया। सालों बाद जकनचारी ने अपने गांव कायदाला में एक मंदिर बनाने का अपना सपना पूरा किया, कहते हैं कि मंदिर पूरा होते ही एक चमत्कार हुआ और उनकी दाईं बाजू वापिस आ गई।

कायदाला में एक होयसल मंदिर तो है लेकिन जकनचारी का लिखित तौर पर कोई जिक्र नहीं मिलता। वहीं स्कोलर्स का ये दावा है कि जकनचारी एक मिथिकल फिगर है। जहां बेलूर और हेलिबिड मंदिर 12वीं शताब्दी में बनाए गए वहीं 13वीं शताब्दी में सोमनाथपुरा का मंदिर तैयार किया गया। एक अकेले आर्टिस्ट का तीनों मंदिरों को पूरा करने में सहयोग समय के लिहाज से सटीक नहीं बैठता।

वहीं ये भी कहा जाता है कि जकनचारी एक आदमी का नाम ना होकर शिल्पकारों के समूह का नाम भी हो सकता है जो कर्नाता-द्रविड़ स्टाइल में माहिर थे और इस सदी के दौरान काम भी कर रहे थे। स्कोलर्स का ये भी कहना है कि जकनचारी दक्षिणाचार्य और टेंकनाचार्य से निकला हो सकता है जिसका मतलब होता है दक्षिण के शिल्पकार।

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ऐसे हुआ था मंदिर का प्रचार

Hoysalesvara मंदिर दोरासमुद्रा टैंक के किनारे पर बना है। हेलिबिड में कई तरह के संरक्षित और असंरक्षित मंदिर है। यहां पर किलों के अवशेष  और कई बड़े दरवाजे हैं जो कभी इस एरिया की रक्षा किया करते थे। इस मंदिर का एरिया 7 हेक्टेयर है। Captain Linnaeus Tripe की कुछ तस्वीरों की बदौलत ये कला पश्चिमी देशों में जा पहुंची। Captain Linnaeus Tripe ईस्ट इंडिया कंपनी के शुरुआती ऑफिशियल फोटोग्राफर्स में से एक थे। 1854 में कैप्टन ने हेलिबिड और बेलूर के मंदिरों की तस्वीरें खींचने का जिम्मा उठाया था।

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