स्टार्टअप कंपनियां हाई वैल्यूएशन के जरिए अधिक से अधिक फंड जुटाने की कोशिश करती हैं। हालांकि वैल्यूएशन अधिक रखने की स्ट्रैटजी हमेशा कारगर ही हो, यह जरूरी नहीं है। दिग्गज ब्रोकरेज फर्म जीरोधा (Zerodha) के फाउंडर नितिन कामत (Nithin Kamath) का मानना है कि बिजनेस के फंडामेंटल्स और वैल्यूएशन के बीच भारी गैप होने पर स्टार्टअप की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। कामत ने लिक्विडेशन प्रिफरेंस को लेकर 8 ट्वीट्स की एक कड़ी में इसे समझाया है कि हाई वैल्यूएशन से क्या दिक्कतें आ सकती हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा कि कारोबार में सब कुछ सही न चल रहा हो तो हाई वैल्यूएशन पर जो निवेश जुटाया गया है, वह कर्ज के बोझ की तरह हो जाता है।
कारोबार को झटका लगे तो कर्ज का बोझ बन जाता है निवेश
कामत ने अपना ट्वीट लिक्विडेशन को लेकर किया है जिसके तहत बाकी लोगों से पहले निवेशकों को अपना निवेश मिलता है। आमतौर पर निवेश को कर्ज नहीं समझा जाता है लेकिन जब कारोबार नहीं बढ़ता है तो यह कर्ज की तरह हो जाता है। जीरोधा के फाउंडर कामत के मुताबिक लिक्विडेशन प्रिफरेंस तभी तक सही है जब तक वैल्यूएशन बढ़ रहा है और हर नए राउंड में निवेश बढ़ रहा हो और सभी निवेशक मुनाफे में हों। हालांकि अगर ग्रोथ को झटका लगे या हाई वैल्यूएशन पर नया फंड जुटाने में दिक्कत आए तो निवेश कर्ज की तरह हो जाता है।
कामत के मुताबिक कारोबार के फंडामेंटल्स के विपरीत वैल्यूएशन काफी हाई हो जाए तो तगड़ा झटका लगता है। ऐसे में सभी निवेश लौटाना होता है और फिर फाउंडर्स और टीम के लिए कोई तेजी बाकी नहीं रह जाती है। ऐसे में कारोबार को लेकर दिलचस्पी घट जाती है और कंपनी की कोर टीम इसे छोड़ने लगती है। निवेश के हर नए राउंड के बाद लिक्विडिटी की आशंकाएं बढ़ने लगती है और फाउंडर्स और टीम के इक्विटी की वैल्यू घटने लगती है।
अति हर चीज की बुरी, चाहे वह वैल्यूएशन ही क्यों न हो
कामत ने एक अनुभव साझा किया है कि उनकी एक ऐसे शख्स से भेंट हुई जिसने यूनिकॉर्न वैल्यूएशन पर करोड़ों का फंड जुटाया। हालांकि बाद में उन्हें महसूस हुआ कि उनका कारोबार उतनी तेजी से नहीं बढ़ रहा है जो आने वाले वर्षों में भी वैल्यूएशन को जस्टिफाई कर सके। कामत ने कहा कि उस शख्स का कारोबार बहुत अच्छा है लेकिन अब फाउंडर कुछ और चाहते हैं।
कामत के मुताबिक मौजूदा दौर में जब फंडिंग की काफी दिक्कतें आ रही हैं यानी कि फंडिंग का विंटर सीजन चल रहा है यानी कि माहौल काफी ठंडा है तो टेक निवेशकों के लिए यह सीखने का समय है। वे यह सीख सकते हैं कि भारत में कारोबार को अलग तरीके से सेटअप करना चाहिए जहां एमएंडए (मर्जर एंड एक्विजिशन) और आईपीओ को लिक्विडेशन प्रिफरेंस से जुड़े मुद्दों से निपटना आसान नहीं है।