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क्या इस लोकसभा चुनाव में 'छोटे चौधरी' को बागपत पहनाएगा ताज, जयंत के पक्ष में दिख रही हवा को अपनी तरफ मोड़ पाएंगे अखिलेश?

Lok Sabha Elections 2024: RLD के प्रवक्ता अनिल दुबे कहते हैं कि इस बार पूरा बागपत छोटे चौधरी के साथ खड़ा है। वहां पर चुनाव एकतरफा होने जा रहा है। इतना साफ है कि बागपत से NDA के साथ मिलकर, जो भी मैदान में उतरता उसके लिए चुनावी लड़ाई थोड़ा आसान ही होती। बागपत के लोग जयंत चौधरी को 'छोटे चौधरी' कह कर पुकारते हैं और उनके प्रति लोगों का सम्मान भी है

Brijesh Shuklaअपडेटेड Mar 04, 2024 पर 6:15 AM
क्या इस लोकसभा चुनाव में 'छोटे चौधरी' को बागपत पहनाएगा ताज, जयंत के पक्ष में दिख रही हवा को अपनी तरफ मोड़ पाएंगे अखिलेश?
Lok Sabha Elections 2024: बागपत में जयंत चौधरी के पक्ष में दिख रही हवा को अपनी तरफ मोड़ पाएंगे अखिलेश?

Lok Sabha Elections 2024: बागपत (Baghpat) लोकसभा सीट कौरव नरेश धृतराष्ट्र से श्री कृष्ण ने शांति दूत के रूप में जिन पांच गांवों को पांडवों के लिए मांगा था, उनमें से बागपत भी एक था। वास्तव में बागपत का असली नाम 'व्याघ्रप्रस्थ' था। क्योंकि यहां पर कभी बाघों का निवास हुआ करता था। राजधानी दिल्ली से नजदीक होने के कारण बागपत का जलवा बुलंद रहता है। वास्तव में पहले यह मेरठ का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन 1997 में बागपत एक नया जिला बना गया। पिछले लोकसभा चुनाव में जब बागपत का हाल-चाल जानने के लिए बस पर सवार हुआ, तो मेरठ में ट्यूशन पढ़ने आए छात्रों ने सलाह दी कि आप बागपत आए हैं, तो यहां की बालूशाही जरुर खा कर जाइएगा।

बालूशाही क्यों? उन छात्रों ने बताया की बागपत की बालूशाही पूरी देश में प्रसिद्ध है। विदेश तक भेजी जाती है। यमुना के किनारे बसे जिला बागपत में संपन्न किसान भी हैं और यहां खेती मुख्य व्यवसाय है। बागपत में पुरा महादेव मंदिर, मनसा देवी, वाल्मीकि आश्रम है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहां पर बरनावा कस्बा है, जिसका नाम पहले 'वर्णावत' था। वर्णावत का नाम महाभारत में कई बार आया है। जहां पर दुर्योधन ने लाक्षग्रह का बनवाया किया, था जिससे पांडव उसमें जल कर भस्म हो जाए। लेकिन पांडव बच गए।

चौधरी चरण सिंह का क्षेत्र रहा है बागपत

वास्तव में हस्तिनापुर से लेकर दिल्ली तक पांडवों और कौरवों के इतिहास से भरा पड़ा हैं। इस संबंध में तमाम कहानियां हैं। यह क्षेत्र चौधरी चरण सिंह के नाम से भी जाना जाता है। इंदिरा गांधी के तमाम प्रयास के बावजूद चौधरी चरण सिंह को चुनाव में नहीं हराया जा सका।

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