इस बात की काफी संभावना है कि विकसित देशों में अभी कई और तिमाहियों तक महंगाई ऊंचे स्तरों पर बनी रहे। महंगाई की वजह सिर्फ कच्चे तेल की कीमतों में बढ़त ही नहीं है। महंगाई की मूल वजह अमेरिका और यूरोप में पिछले दो साल या उससे भी पहले से आई बेलगाम लिक्विडिटी है। ये बातें लैडरअप वेल्थ मैनेजमेंट (Ladderup Wealth Management)के मैनेजिंग डायरेक्टर राघवेंद्र नाथ ने मनीकंट्रोल के साथ हुई बातचीत में कही हैं। राघवेंद्रनाथ का ये भी मानना है कि अगर आप कैपेक्स साइकिल का फायदा उठाने के लिए प्राइवेट बैंकों में निवेश करना चाहते हैं तो ये गलत फैसला होगा। यहां हम आपके लिए राघवेंद्रनाथ से हुई लंबी बातचीत का संपादित अंश दे रहे हैं।
बाजार की सटीक भविष्यवाणी नामुमकिन
क्या आपको लगता है कि बाजार अधिकांश निगेटिव खबरों को पचा चुका है? इस सवाल का जवाब देते हुए राघवेंद्रनाथ ने कहा कि हम एक दम सही तौर पर कभी भी ये नहीं कह सकते कि बाजार किसी निगेटिव या पॉजिटिव खबर को पूरी तरह पचा चुका है। बाजार निवेशकों के सेंटीमेंट का पैमाना होता है जो खबरों के साथ ऊपर नीचे होता रहता है।
ग्लोबल मार्केट इस समय कुछ सीमा तक महंगाई, बढ़ती ब्याज दरों, यूक्रेन युद्ध और मंदी से जुडे़ निगेटिव न्यूज फ्लो पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है। लेकिन इनके बल पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। दूसरी तरफ भारत में पिछले कुछ महीनों के दौरान निगेटिव ग्लोबल खबरों पर कुछ रिऐक्शन देखने को मिला। लेकिन उसके बाद भारतीय बाजार में तेज रैली आई और इस समय ये अपने पिछले शिखर के करीब दिख रहा है।
अगली दिवाली तक 15 फीसदी रिटर्न मुमकिन
क्या भारतीय बाजार अगली दिवाली तक निवेशकों को 15 फीसदी रिटर्न दे सकता है? इस सवाल का जबाव देते हुए राघवेंद्र नाथ ने कहा कि इक्विटी मार्केट में कुछ भी असंभव नहीं है। तो हम कह सकते हैं कि हां, अगले 12 महीनों में भारतीय इक्विटी मार्केट में 15 फीसदी रिटर्न मुमकिन है। भारतीय बाजार पहले से ही दुनिया के दूसरे बाजारों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन अगर महंगाई और मंदी से जुड़ी चुनौती अगले साल भी बनी रहती है तो अगले 12 महीनों में बाजार को कोई बड़ी तेजी दर्ज करने में मुश्किल होगी। वहीं, अगर दूसरी तरफ यूक्रेन-रूस युद्ध का कोई समाधान निकल जाता है, मौद्रिक नीतियों में नरमी आती है और वास्तविक मंदी की अवधि छोटी होती है तो इस बात की संभावना है कि ग्लोबल बाजार के साथ ही भारतीय बाजार भी अच्छा रिटर्न देंगे।
कैपेक्स साइकिल का फायदा उठाने के लिए प्राइवेट बैंकों पर दांव लगाना सही नहीं
क्या आपको लगता है कि कैपेक्स साइकिल का फायदा उठाने के लिए प्राइवेट बैंकों पर दांव लगाना चाहिए? इस सवाल के जवाब में राघवेंद्र नाथ ने कहा कि अगर आप कैपेक्स साइकिल का फायदा उठाने के लिए प्राइवेट बैंकों में निवेश करना चाहते हैं तो ये गलत फैसला होगा। अधिकांश प्राइवेट बैंक रिटेल क्रेडिट और शॉर्ट टर्म कॉर्पोरेट क्रेडिट (कंपनियों द्वारा लिए जानें शॉर्ट टर्म कर्ज ) पर फोकस कर रहे हैं। प्राइवेट बैंकों में मुझे नई या पुरानी परियोजनाओं ( green और brownfield प्रोजेक्ट) के विस्तार के लिए कर्ज देने को लेकर कोई उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है।
ऐसे में अगर आप कैपेक्स साइकिल का फायदा उठाने के लिए निवेश करना चाहते हैं तो आपको सीधे इंजीनियरिंग और कैपिटल गुड्स कंपनियों या फिर बड़े सरकारी बैंकों में निवेश करना चाहिए। बड़े सरकारी बैंकों को पहले से ही बड़ी परियोजनाओं की फंडिंग के लिए जाना जाता है।
रुपए की कमजोरी से एक्सपोर्ट सो जुड़े शेयरों को फायदा
रुपए की कमजोरी को ध्यान में रखते हुए कहां करें निवेश? इस सवाल का जवाब देते हुए राघवेंद्र नाथ ने कहा कि रुपए में दूसरे देशों की करेंसीज के मुकाबले काफी कम गिरावट हुई है। डॉलर के मुकाबले यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन में रुपए की तुलना में काफी ज्यादा गिरावट हुई है। शेयर बाजार के नजरिए से देखें तो कमजोर रुपया एक्सपोर्ट आधारित सेक्टरों को मदद करता है। लेकिन जैसा कि पहले भी कह चुका हूं कि जो कुछ भी पिछले 12 महीनों में हुआ है उसके अगले 12 से 18 महीने में फिर से दुहराए जाने की गारंटी नहीं है। इस बात की बड़ी संभावना नजर आ रही है कि रुपया वर्तमान लेवल के करीब स्थिर होता नजर आए या फिर मिडियम टर्म में इसमें और मजबूती भी आती दिख सकती है।
IT सेक्टर के लिए मंदी बड़ी चिंता
IT सेक्टर की संभावनाओं पर राघवेंद्र नाथ ने कहा कि आईटी सेक्टर अपनी मांग के लिए अमेरिकी और यूरोपीय बाजारों पर काफी ज्यादा निर्भर है। ये दोनों ही बाजार एक लंबी मंदी के मुहाने पर नजर आ रहे हैं। अगर मंदी लंबी चलती है तो आईटी सेक्टर पर इसका निगेटिव असर देखने को मिल सकता है। ऐसे में सबसे अच्छा तरीका ये होगा कि इस सेक्टर में किसी निवेश निर्णय के पहले इस बात पर नजर रखें कि अगली कुछ तिमाहियों में ग्लोबल मैक्रो स्थितियां क्या मोड़ लेती हैं।
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