क्या भारत पर जीवन का सबसे बड़ा शॉर्ट सेलिंग का दांव लगाने जा रहे George Soros?

George Soros vs Narendra Modi : हो सकता है कि जॉर्ज सोरोस भारत पर एक बड़ी शॉर्ट सेलिंग की योजना बना रहे हों। हालांकि, रुपया पूरी तरह से कन्वर्टिबल नहीं है, इसलिए इस पर निशाना साधने से उतना शानदार मुनाफा होने की संभावना नहीं है जैसा उन्होंने 1998 में थाई बाट और मलेशियाई रिंगिट को शॉर्ट-सेल करके कमाया था

अपडेटेड Feb 19, 2023 पर 4:18 PM
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George Soros vs Narendra Modi : जॉर्ज सोरोस लंबे समय से खुद को दुनिया भर में लोकतंत्र के चैंपियन के रूप में देखते रहे हैं, हालांकि उनके लिए ‘लोकतंत्र’ का मतलब वास्तव में एक राजनीतिक दल या सरकार होती है जो उन्हें सही लगती है

SANDIPAN DEB

George Soros :  अदाणी ग्रुप (Adani group) के शेयरों में उठे बिकवाली के तूफान के बाद हंगरी-अमेरिका के अरबपति और हेज फंड मैनेजर जॉर्ज सोरोस ने कुछ ऐसा कहा कि जिस पर कुछ दिनों से विवाद हो रहा है। सोरोज ने गुरुवार, 16 फरवरी 2023 को कहा कि नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) को “संसद में विदेशी इनवेस्टर्स से उठ रहे सवालों का जवाब देना होगा।” उन्होंने अपनी स्पीच को पढ़ते हुए कहा, “इससे भारत सरकार पर मोदी की पकड़ खासी कमजोर हो जाएगी। इससे बहु प्रतीक्षित संस्थागत सुधारों के लिए नए दरवाजे खुलेंगे। हो सकता है कि मैं कुछ मुखर हूं, लेकिन मैं भारत में लोकतांत्रिक पुनरुद्धार की उम्मीद करता हूं।”

मोदी पर क्या बोलते रहे हैं सोरोस


सोरोस पिछले कुछ समय से भारत पर बोल रहे हैं। 2020 में दावोस में हुई वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक में सोरोस ने कहा था कि “सबसे बड़ा और सबसे भयावह झटका (दुनिया में लोकतंत्र के लिए) भारत में लगा है, जहां लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नरेंद्र मोदी एक हिंदू राष्ट्रवादी सरकार का निर्माण कर रहे हैं, एक अर्ध-स्वायत्त मुस्लिम क्षेत्र कश्मीर में दंडात्मक कदम उठा रहे हैं और लाखों मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करने की धमकी दे रहे हैं।”

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राजनीतिक फंडिंग करते रहे हैं सोरोस

सोरोस लंबे समय से खुद को दुनिया भर में लोकतंत्र के चैंपियन के रूप में देखते रहे हैं, हालांकि उनके लिए ‘लोकतंत्र’ का मतलब वास्तव में एक राजनीतिक दल या सरकार हो सकती है जिसे वह मंजूरी देते हैं। उन्होंने पूर्वी यूरोप और पूर्व सोवियत गणराज्यों में विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों को वित्तपोषण किया है। वह अमेरिकी इतिहास में डेमोक्रेटिक पार्टी को सबसे ज्यादा फंडिंग करते रहे हैं और करोड़ों डॉलर के साथ बराक ओबामा, हिलेरी क्लिंटन और जो बिडेन को राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन दिया।

8.6 अरब डॉलर है नेटवर्थ

फोर्ब्स मैगजीन के मुताबिक, 32 अरब डॉलर से ज्यादा रकम अपनी ओपन सोसायटी फाउंडेशंस दान में देने के बाद मार्च 2021 तक उनकी नेटवर्थ 8.6 अरब डॉलर थी। इसलिए, आसानी से यह माना जा सकता है कि उन्होंने मोदी विरोधी मीडिया और भारत में एक्टिविस्ट्स को फंडिंग की थी। साथ ही, वह इस दिशा में अपना एक्सपोजर बढ़ा रहे हैं। यहां पर एक्सपोजर शब्द का इस्तेमाल करने की मुख्य वजह यह है कि सोरोस आखिरकार पैसा बनाना चाहते हैं।

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सोरोस बोले-मेरा काम पैसा कमाना

1998 में एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने कई पूर्व एशियाई देशों में उनकी करेंसीज के खिलाफ दांव लगाकर और आर्थिक पतन को बढ़ावा दिया था। उन्होंने जवाब दिया, “मैं बुनियादी रूप से वहां पैसा बनाने के लिए हूं। मैं जो करता हूं उसके सामाजिक परिणामों को नहीं देख सकता और न ही देखता हूं...मैं खुद को दोषी महसूस नहीं करता। मैं नैतिक गतिविधि में नहीं हूं, जिसका मतलब यह नहीं है कि मैं गलत हूं।”

सोवियत देशों में रहे हैं सक्रिय

कुल मिलाकर सोरोस ने कभी अपना एजेंडा नहीं छिपाया। उन्होंने कई बार कहा कि वह अपने वैसे दुनिया को वह आकार देना चाहते हैं, जो उन्हें ठीक लगता है। यह भी सब जानते हैं कि उन्होंने कई पूर्व सोवियत ब्लॉक देशों को साम्यवादी तानाशाही से लोकतंत्र तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि कई मामलों में, लोकतंत्र का वह सपना टूट गया है और केवल इसी हकीकत के साथ जीवित है कि इन देशों में समय-समय पर चुनाव होते रहते हैं।

सोरोस इस बात से आश्वस्त हैं कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है। और एक बार जब उनके दिमाग में कोई बात बैठ जाती है तो वह उसके पीछे अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य सरकार की “ड्रग्स के खिलाफ युद्ध” नीति के खिलाफ प्रचार करते हुए, वह बच्चों की किताब इट्स जस्ट ए प्लांट (It's Just a Plant) लिखवाने में मदद करने की हद तक चला गया, जिसमें मारिजुआना के उपयोग को बढ़ावा दिया गया था। लेकिन हो सकता है कि वह भारत पर भी हमला करना चाह रहे हों।

क्या भारत में शॉर्ट सेलिंग की है योजना

हो सकता है कि वह भारत पर एक बड़ी शॉर्ट सेलिंग की योजना बना रहे हों। रुपया पूरी तरह से कन्वर्टिबल नहीं है, इसलिए इस पर निशाना साधने से उस तरह का शानदार मुनाफा नहीं हो सकता है जैसा उन्होंने 1998 में थाई भाट और मलेशियाई रिंगिट को शॉर्ट-सेल करके कमाया था। लेकिन उनकी नजर शेयर बाजार पर हो सकती है। वह निश्चित रूप से प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो दोनों विदेशी निवेशकों से बात करेंगे और मोदी विरोधी लाइन को आगे बढ़ाने के लिए पश्चिमी और भारतीय मीडिया और थिंक टैंक और एनजीओ दोनों को फंडिंग करेंगे।

भारत में एक साल बाद लोकसभा चुनाव होने हैं। कुछ दिलचस्प दौर और कई साजिशों की कहानियों की उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन भारत दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है और मोदी सबसे ज्यादा पसंदीदा लीडर बने हुए हैं। ऐसे में हो सकता है सोरोस को यह दांव उलटा पड़ जाए।

(संदीपन देब एक स्वतंत्र लेखक हैं। उनके ये विचार व्यक्तिगत हैं।)

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