घरेलू संस्थागत निवेशक दुनिया में बढ़ती मैक्रो अनिश्चितताओं के बीच तथाकथित मंदी प्रूफ सेक्टरों की तरफ रुख कर रहे हैं। इस साल अब तक घरेलू निवेशक जिन सेक्टरों पर ‘overweight’ पोजिशन में है उनमें कंज्यूमर स्टेपल्स, कम्यूनिकेशंन सर्विसेज और यूटिलिटी जैसे सेक्टर शामिल हैं। इन तीनों सेक्टरों को परंपरागत रुप से आर्थिक अनिश्चितता के दौर में कम जोखिम वाला सेक्टर माना जाता है।
घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) कंज्यूमर स्टेपल्स स्टॉक्स पर निफ्टी 50 इंडेक्स में उनके वेट की तुलना में 3.10 फीसदी ओवरवेट हैं। जबकि ये यूटिलिटी सेक्टर पर 2.10 फीसदी ओवरवेट हैं। ये आंकड़े Morgan Stanley विवरण पर आधारित हैं।
ब्रोकरेज फर्म मॉर्गन स्टेनली ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि हम इस समय मैक्रो- ड्रिवेन मार्केट में है। गौरतलब है कि हाल के बाउंसबैक को छोड़ दे तो ग्लोबल इक्विटी मार्केट लंबे समय से दबाव में है। पूरी दुनिया में ब्याज दरों में बढ़ोतरी, महंगाई के बढ़ते दबाव और रूस-यूक्रेन की लड़ाई के कारण उत्पन्न परिस्थितियों की वजह से परेशानी देखने को मिल रही है।
बढ़ती महंगाई से निपटने के लिए यूएस फेड ने अब तक अपनी ब्याज दरों में 2.25 फीसदी की बढ़ोतरी की है जबकि भारत के आरबीआई ने सिर्फ 0.90 फीसदी की बढ़ोतरी की है। पूरी दुनिया में लिक्विडिटी में आ रही कमी और अमेरिका के ट्रेजरी मार्केट के तुलनात्मक रूप से ज्यादा आर्कषक होने की वजह से भारतीय इक्विटी बाजार से पिछले एक साल में 32 अरब डॉलर से ज्यादा की फॉरेन फंड निकासी हुई है।
मध्य जून तक सेंसेक्स और निफ्टी में उनके हाई से 17 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिली है। हालांकि जून के मध्य से सेंसेक्स-निफ्टी में 10 फीसदी से ज्यादा की रैली आई है। सरकार की तरफ से महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिशों का बाजार पर सकारात्मक असर पड़ा है। इसके अलावा बाजार में यह उम्मीद भी पैदा हुई है कि यूएस फेड अमेरिकी अर्थव्यवस्था में किसी मंदी से बचने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी के अपने रुख में नरमी लाएगा। इस उम्मीद के चलते भी भारतीय बाजार को राहत मिली है।
घरेलू संस्थागत निवेशकों के डिफेंसिव सेक्टरों की तरफ रुझान बढ़ने से इस बात का संकेत मिलता है कि फंड मैनेजर घरेलू इकोनॉमिक ग्रोथ को लेकर सर्तक नजर आ रहे हैं। गौरतलब है कि कई एजेंसियो ने, जिनमें IMF भी शामिल है , भारत के जीडीपी ग्रोथ अनुमान में हाल में कटौती की है। IMF ने इसी हफ्ते की शुरुआत में भारत के जीडीपी ग्रोथ अनुमान में 0.80 फीसदी की कटौती करके इसको 7.4 फीसदी कर दिया है। IMF का कहना है कि ग्लोबल स्थितियां अच्छी नजर नहीं आ रही हैं। इसके अलावा मौद्रिक नीतियों में आ रही कड़ाई से भी ग्रोथ पर असर पड़ेगा।
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SBI Mutual Fund ने अपने हाल में जारी नोट में कहा है कि मार्जिन पर दबाव और मांग में सुस्ती के चलते नियर टर्म में कंपनियों के प्रदर्शन में कमजोरी देखने को मिल सकती है।
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