SEBI म्यूचुअल फंडों को सीधे शेयर खरीदने-बेचने की सुविधा देना चाहता है, प्रस्ताव लागू होने पर ब्रोकिंग इंडस्ट्री को लगेगा झटका

अगर म्यूचुअल फंड कंपनियों को सीधे स्टॉक एक्सचेंजों से शेयरों को खरीदने और बेचने की सुविधा दी जाती है तो इससे फ्रंट रनिंग के मामलों पर रोक लगेगी। साथ ही ब्रोकरेज चार्जेज पर म्यूचुअल फंड कंपनियों के खर्च में कमी आएगी

अपडेटेड Mar 10, 2023 पर 1:43 PM
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अभी म्यूचुअल फंड कंपनियां ब्रोकरेज फर्मों के जरिए शेयरों की खरीदती और बेचती हैं। ट्रांजेक्शन पर आने वाले ब्रोकरेज चार्जेज म्यूचुअल फंडों के Total Expense Ratio (TER) में शामिल नहीं होते हैं।

SEBI के इस प्रस्ताव के लागू होने पर ब्रोकिंग इंडस्ट्री (Broking Industry) को बड़ा झटका लग सकता है। यह म्यूचुअल फंड कंपनियों को भी नाखुश कर सकता है। सेबी एक प्रस्ताव पर विचार कर रहा है, जिसमें म्यूचुअल फंड कंपनियों को स्टॉक एक्सचेंजों की मेंबरशिप लेने को कहा जा सकता है। इससे वे अपने ट्रेडिंग टर्मिनल्स से ट्रेडिंग कर सकेंगी। मामले से जुड़े म्यूचुअल फंडों के दो सीनियर एग्जिक्यूटिव्स ने यह मनीकंट्रोल को इस बारे में बताया। एक एग्जिक्यूटिव ने कहा कि यह मामला अभी चर्चा के शुरुआती चरण में है...इसके दो मकसद हैं। SEBI ने इस मसले पर ज्यादा जानकारी के लिए पूछे गए सवालों के जवाब नहीं दिए।

अभी क्या  है सिस्टम?

अभी म्यूचुअल फंड कंपनियां ब्रोकरेज फर्मों के जरिए शेयरों की खरीदती और बेचती हैं। ट्रांजेक्शन पर आने वाले ब्रोकरेज चार्जेज म्यूचुअल फंडों के Total Expense Ratio (TER) में शामिल नहीं होते हैं। म्यूचुअल फंड कंपनियां TER यूनिटहोल्डर्स (investors) से वसूलती हैं। म्यूचुअल फंड्स हर ट्रेड के लिए ब्रोकरेज फर्मों को करीब 0.12 फीसदी (ब्रोकरेज चार्ज) चुकाते हैं। अगर म्यूचुअल फंड्स डायरेक्ट मार्केट एक्सेस (DMA) रूट के जरिए यह ट्रेड करते हैं तो यह चार्ज घटकर सिर्फ 0.06 फीसदी रह जाएगा।


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क्या बदलाव आएगा?

DMA रूट से ट्रेड करने पर म्यूचुअल फंड्स के डीलर्स सीधे अपने टर्मिनल के जरिए ट्रेड कर सकेंगे। सेबी इस पर आने वाले चार्जेज को TER में शामिल करना चाहता है। एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (AMC) इसका विरोध कर रही हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसा होने पर उनके प्रॉफिट मार्जिन में कमी आएगी। यह कॉस्ट इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कितनी बार अपने पोर्टफोलियो के लिए शेयरों को खरीदती और बेचती हैं। इसका एक सॉल्यूशन SEBI यह ऑफर कर रहा है, जिसमें म्यूचुअल फंड्स के अपने ब्रोकिंग टर्मिनल्स हो सकते हैं। इससे लंबी अवधि में कॉस्ट घटाने में मदद मिलेगी।

फ्रंट रनिंग पर अंकुश लगेगा?

सेबी का दूसरा मकसद म्यूचुअल फंडों के ट्रेड्स में ब्रोकर्स की तरफ से की जाने वाली फ्रंट रनिंग पर अंकुश लगाना है। फ्रंट रनिंग का मतलब ऐसे प्रैक्टिस से है, जिसमें ब्रोकर किसी खास शेयर में क्लाइंट के ट्रांजेक्शन से पहले ही ट्रेड करता है और इससे मुनाफा कमाता है। यह प्रैक्टिस पिछले साल तब सुर्खियों में आया था, जब Axis Mutual Fund के चीफ डीलर विरेश जोशी को फ्रंट रनिंग का दोषी पाया गया था। उन्होंने कई स्कीमों के मामले में फ्रंट रनिंग की थी। सेबी ने हाल में दिए अपने आदेश में विरेश और 20 लोगों को अगले आदेश तक मार्केट में ट्रेड करने पर रोक लगा दी है।

नई व्यवस्था फुल प्रूफ होगी?

म्यूचुअल फंड्स के एक दूसरे एग्जिक्यूटिव ने कहा, "SEBI का यह मानना है कि जब ट्रेड ब्रोकर्स के जरिए नहीं होगा तो उससे जुड़ी जानकारियां दूसरे किसी व्यक्ति तक नहीं पहुंचेंगी। लेकिन, यह फुल प्रूफ नहीं है। जब आप बड़ी संख्या में शेयरों को खरीदना या बेचना (Block Deal) चाहते हैं तो आपको मार्केट में Ask प्लेस करना पड़ता है। इससे जानकारी लीक हो जाती है।"

ब्रोकिंग कंपनियों के प्रॉफिट पर कैसे असर पड़ेगा?

अगर सेबी का यह प्रस्ताव लागू होता है तो इसका असर बड़ी ब्रोकिंग कंपनियों के प्रॉफिट पर भी पड़ेगा। इसकी वजह है कि म्यूचुअल फंड कंपनियां उनके रेवेन्यू के बड़े स्रोत हैं। म्यूचुअल फंड कंपनियां बहुत ज्यादा इक्विटी एसेट को मैनेज करती हैं। 2022 में म्यूचुअल फंड कंपनियों का शेयरों का ग्रॉस सेल और पर्चेज 23 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का था। इसका ब्रोकिंग कमीशन करीब 2,800 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है।

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