रुपया डॉलर के मुकाबले गिरकर 19 मई को 96.45 के अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गया। इसकी वजह क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतें हैं। 19 मई को ब्रेंट क्रूड का भाव 110 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया। इसका असर रुपये पर पड़ा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि क्रूड की ऊंची कीमतों से भारत के इंपोर्ट बिल पर दबाव बढ़ रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका-ईरान के बीच लड़ाई शुरू होने के बाद से रुपये में बड़ी कमजोरी आई है।
फिलहाल रुपये पर दबाव बने रहने के आसार
सीआर फॉरेक्स एडवाइजर्स के अमित पाबरी ने कहा, "फॉरेक्ट मार्केट के लिए अभी सबसे बड़ी चुनौती दिशा नहीं बल्कि कॉन्फिडेंस है। जब तक मध्यपूर्व में टेंशन में कमी नहीं आती और विदेशी फंडों की बिकवाली कम नहीं होती, रुपये पर दबाव बना रहेगा।" उन्होंने कहा कि डॉलर के मुकाबले रुपये को 94.80-95.10 की रेंज में सपोर्ट मिल सकता है। लेकिन, ग्लोबल रिस्क बने रहने पर रुपया 97 की तरफ कदम बढ़ा सकता है।
आम आदमी पर भी पड़ेगा रुपये में कमजोरी का असर
रुपये में लगातार कमजोरी का असर आम आदमी पर भी पड़ना शुरू हो गया है। कई आयातित प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ने लगी हैं। इनमें स्मार्टफोन, लैपटॉप, कैमरा जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स शामिल हैं। भारत खाद्य तेल और दलहन का भी काफी मात्रा में आयात करता है। इनकी कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इसका असर आम आदमी के बजट पर पड़ेगा। पहले से ही पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ने का खतरा है। रुपये में कमजोरी से विदेश में पढ़ाई, विदेश में इलाज और विदेश यात्रा भी महंगा हो जाएगा। खासकर अमेरिका में पढ़ाई करने वाले इंडियन स्टूडेंट्स का खर्च बढ़ जाएगा।
मध्यपूर्व में लड़ाई ने रुपये पर बढ़ाया दबाव
इस साल रुपये में बड़ी गिरावट देखने को मिली है। डॉलर के मुकाबले यह करीब 6-7 फीसदी तक गिरा है। पहले रुपये पर दबाव की वजह विदेशी फंडों की भारतीय शेयर बाजार में बड़ी बिकवाली थी। उसके बाद मध्यपूर्व में लड़ाई शुरू होने के बाद रुपये पर दबाव और बढ़ गया है। हालांकि, रुपये में कमजोरी भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छी खबर है। इससे उनकी कमाई बढ़ सकती है। आईटी और फार्मा सेक्टर को रुपये में कमजोरी से फायदा हो सकता है।