भारतीय रुपये में गिरावट का सिलसिला 20 मई को भी जारी रहा। रुपया न सिर्फ डॉलर बल्कि दूसरी करेंसीज के मुकाबले भी कमजोर हो रहा है। सिर्फ एक साल में यह डॉलर के मुकाबले 13.2 फीसदी गिरा है। इस साल यह डॉलर के मुकाबले करीब 8 फीसदी गिरा है। इस तरह गिरता रहा तो यह जल्द 100 के लेवल तक पहुंच सकता है।
रुपये में लगातार आ रही गिरावट
20 मई को भी फॉरेक्स मार्केट में रुपये पर दबाव दिखा। यह कारोबार शुरू होते ही गिरकर 96.90 के रिकॉर्ड लो लेवल पर पहुंच गया। हालांकि, कारोबार के अंत में यह 96.82 के लेवल पर बंद हुआ। 2026 की शुरुआत में यह डॉलर के मुकाबले 89.89 के लेवल पर था। इसके बाद से इसमें लगातार गिरावट जारी है। पिछले साल 20 मई को यह 85.50 के लेवल पर था।
बांग्लादेश के टका के मुकाबले भी गिरा
अगर पड़ोसी देश बांग्लादेश की करेंसी टका की बात की जाए तो भारतीय रुपये इसके मुकाबले भी कमजोर हुआ है। इकोनॉमिक टाइम्स की एक खबर के मुताबिक, एक साल पहले एक रुपये की कीमत 1.42 बांग्लादेशी टका के बराबर थी। अब यह 1.28 टका रह गई है। इसका मतलब है कि बीते एक साल में टका के मुकाबले भारतीय रुपये कमजोर हुआ है। फीसदी में यह कमजोरी करीब 10 फीसदी है।
बांग्लादेश में आज रुपये से कम सामान खरीद सकेंगे
इसका मतलब है कि एक साल पहले हम बांग्लादेश में 10 रुपये से 14 टका कीमत का कोई समान खरीद सकते थे। लेकिन, आज हम 10 रुपये से सिर्फ 12 टका मूल्य का सामान बांग्लादेश में खरीद सकते हैं। इसका मतलब यह भी है कि अगर आप आज बांग्लादेश जाते हैं तो एक साल पहले के मुकाबले आपको ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगी। इसकी वजह यह है कि बांग्लादेशी टका के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर हुआ है।
पाकिस्तान के रुपये के मुकाबले भी कमजोर
वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते एक साल में भारतीय रुपया पाकिस्तान की करेंसी के मुकाबले भी कमजोर हुआ है। 15 मई से लेकर अब तक पाकिस्तान की करेंसी के मुकाबले भारतीय रुपया 11.86 फीसदी गिरा है। अगर सिर्फ 2026 की बात की जाए तो भी भारतीय रुपया पाकिस्तान के रुपये के मुकाबले कमजोर हुआ है।
क्या इसका मतलब भारत की इकोनॉमी कमजोर है?
सवाल है कि क्या किसी देश की करेंसी में कमजोरी या मजबूती उसकी इकोनॉमी की सेहत का संकेत हैं? इस सवाल का जवाब ना है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसी देश की करेंसी की वैल्यू में उतार-चढ़ाव इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश के पास कितना डॉलर आता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि आज अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है। चूंकि, भारत अपनी बड़ी आबादी के लिए क्रूड ऑयल, दलहन, खाद्य तेलों का काफी ज्यादा आयात करता है, जिससे उसे डॉलर की काफी जरूरत पड़ती है।
बीते दो साल से विदेशी फंडों की बिकवाली से रुपया दबाव में
पिछले करीब दो साल से विदेशी फंड भारतीय बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ा है। विदेशी फंड डॉलर लेकर आते हैं। उन्हें भारत में निवेश करने के लिए रुपये की जरूरत पड़ती है। जब वे भारतीय बाजार में शेयर बेचते हैं तो उनके हाथ में रुपया आता है। इसे वे डॉलर में बदलते हैं। इसका मतलब है कि जब वे भारतीय बाजार में शेयर बेचते हैं तो डॉलर की मांग बढ़ जाती है। अगर वे भारतीय बाजार में ज्यादा खरीदारी करेंगे तो रुपया मजबूत होगा। अगर वे भारतीय बाजार में बिकवाली करेंगे तो रुपया कमजोर होगा और डॉलर मजबूत होगा।
मध्यपूर्व में तनाव से क्रूड में उछाल से रुपये पर बढ़ा दबाव
इधर, 28 फरवरी को मध्यपूर्व में लड़ाई शुरू होने के बाद से क्रूड की कीमतों में उछाल आया है। भारत चूंकि अपनी जरूरत का 90 फीसदी क्रूड आयात करता है। इससे भारत को क्रूड खरीदने के लिए काफी डॉलर की जरूरत पड़ रही है। इसका असर रुपये पर पड़ रहा है। रुपया कमजोर हो रहा है। हाल में रुपये में आई कमजोरी की बड़ी वजह क्रूड में आया उछाल है। यह थोड़े समय की समस्या है। स्थिति बदलते ही रुपये पर बना दबाव कम हो सकता है।
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