Bank Nifty Crash: भारतीय बैंकिंग सेक्टर के लिए मार्च 2026 बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है। निफ्टी बैंक ने इस महीने मार्च 2020 (कोविड काल) के बाद की अपनी सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की है। इंडेक्स में शामिल सभी 14 शेयरो में इस महीने दोहरे अंकों में गिरावट देखने को मिली। मार्च महीने के दौरान निफ्टी बैंक में 16% से ज्यादा की गिरावट आई, जो इस इंडेक्स के लिए पिछले छह साल का सबसे खराब प्रदर्शन है। इससे पहले मार्च 2020 में यह इंडेक्स 30% से ज्यादा टूट गया था।
सभी बैंक शेयरों में भारी बिकवाली
इस बार की गिरावट की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इंडेक्स का कोई भी शेयर बच नहीं पाया। सभी 14 बैंकिंग शेयरों में 11% से लेकर 22% तक की गिरावट दर्ज की गई, जो सेक्टर में व्यापक दबाव को दिखाता है।
बड़े बैंकों पर सबसे ज्यादा असर
देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के शेयर मार्च में करीब 18% तक गिर गए। वहीं HDFC बैंक के शेयरों में 17.5% की गिरावट आई, जो 2008 के बाद साल की सबसे खराब शुरुआत मानी जा रही है। खास बात यह है कि HDFC बैंक ने 2014 के बाद हर साल पॉजिटिव रिटर्न दिया था, लेकिन इस बार ट्रेंड टूटता दिख रहा है।
SBI के शेयरों में 19% की गिरावट ने इसे इस साल के लिए भी निगेटिव जोन में धकेल दिया है, जबकि यूनियन बैंक के लिए यह सितंबर 2020 के बाद सबसे खराब महीना रहा।
मिड और प्राइवेट बैंकों की हालत भी खराब
यस बैंक (Yes Bank) और एक्सिस बैंक (Axis Bank) के शेयरों में भी तेज गिरावट देखने को मिली। मार्च में यस बैंक करीब 16.46% और एक्सिस बैंक लगभग 16% गिरा। सोमवार के कारोबार में भी दोनों शेयर 3% से 5% तक टूटे।
यस बैंक, जो हाल ही में निफ्टी बैंक इंडेक्स में शामिल हुआ है, इस साल अब तक करीब 20% गिर चुका है, जबकि एक्सिस बैंक में साल की शुरुआत से अब तक 8% की कमजोरी आई है।
हालांकि कुछ बैंक तुलनात्मक रूप से बेहतर प्रदर्शन करते दिखे, लेकिन वे भी गिरावट से बच नहीं पाए। AU स्मॉल फाइनेंस बैंक, फेडरल बैंक और ICICI बैंक इस महीने सबसे कम गिरने वाले शेयर रहे, लेकिन इनमें भी 11% से 13% तक की गिरावट दर्ज की गई।
मार्केट एनालिस्ट्स के मुताबिक, बैंकिंग सेक्टर पर दबाव के पीछे कई बड़े कारण हैं। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, कमजोर रुपया और विदेशी निवेशकों (FII) की लगातार बिकवाली ने बाजार में जोखिम बढ़ाया है।
इसके अलावा, बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी से बैंकों के ट्रेजरी पोर्टफोलियो पर दबाव आता है, जिससे उनकी कमाई प्रभावित होती है।
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