Escrow Account: रिस्की डील है? जानिए खरीदने और बेचने वाले को कैसे भरोसा देता है एस्क्रो अकाउंट
Escrow Account: क्या आपका पैसा डील से पहले सुरक्षित है? एस्क्रो अकाउंट कैसे खरीददार और विक्रेता दोनों को सुरक्षा देता है, कहां होता है इस्तेमाल, और इसके फायदे-नुकसान क्या हैं? जानिए पूरी डिटेल।
एस्क्रो अकाउंट एक ऐसा बैंक खाता होता है, जिसमें लेनदेन की प्रक्रिया पूरी होने तक पैसा सुरक्षित रूप से रखा जाता है।
Escrow Account: अगर आपने कभी किसी कंपनी में निवेश किया है, रियल एस्टेट खरीदी है या कोई हाई-वैल्यू लेनदेन किया है, तो आपने 'एस्क्रो अकाउंट' (Escrow Account) शब्द जरूर सुना होगा। एस्क्रो एक ऐसा फाइनेंशियल अरेंजमेंट होता है, जिसमें खरीदार और विक्रेता के बीच एक तीसरी पार्टी- एस्क्रो एजेंसी या अधिकारी को जोड़ा जाता है। यह एजेंसी उस रकम या किसी भी तरह की संपत्ति को तब तक अपने पास रखती है, जब तक डील की शर्तें पूरी नहीं हो जातीं।
एस्क्रो का मकसद जोखिम कम करना और दोनों पक्षों में भरोसा बढ़ाना होता है। बेचने वाले को तभी भुगतान किया जाता है, जब वह एस्क्रो समझौते की सभी शर्तें पूरी कर देता है। वहीं, खरीदने वाले के पैसे भी तभी जाते हैं, जब समझौता पूरा हो जाता है।
एस्क्रो अकाउंट क्या होता है?
एस्क्रो अकाउंट एक ऐसा बैंक खाता होता है, जिसमें लेनदेन की प्रक्रिया पूरी होने तक पैसा सुरक्षित रूप से रखा जाता है। इसका मतलब है कि एक भरोसेमंद तीसरी पार्टी (जैसे Escrow.com) उस पैसे को तब तक सुरक्षित रखती है। अगर विक्रेता ने तय शर्तें पूरी कर लीं, तो उसे भुगतान मिल जाता है। अगर वह ऐसा नहीं करता, तो खरीदार को उसका पैसा वापस मिल जाता है।
इस तरह के अकाउंट्स में आमतौर पर नकद, स्टॉक्स, या कोई भी संपत्ति रखी जाती है, ताकि दोनों पक्षों को सुरक्षा मिल सके। एस्क्रो एजेंसी इस सेवा के लिए फीस लेती है, जो आमतौर पर लेनदेन के कुल मूल्य का एक प्रतिशत होती है।
एस्क्रो किन-किन क्षेत्रों में होता है इस्तेमाल?
एस्क्रो अकाउंट का इस्तेमाल इंडिविजुअल या बिजनेस लेवल पर कई क्षेत्रों में किया जाता है।
रियल एस्टेट और होम लोन
शेयर बाजार में निवेश
ऑनलाइन बिक्री और खरीदारी
कॉर्पोरेट डील्स और मर्जर
एस्क्रो अकाउंट्स के फायदे
1. सुरक्षा: पैसे तब तक सुरक्षित रहते हैं, जब तक सभी शर्तें पूरी नहीं हो जातीं। इससे धोखाधड़ी का जोखिम काफी कम हो जाता है।
2. पारदर्शिता: इससे टैक्स और इंश्योरेंस जैसे भुगतान नियमित रूप से किए जा सकते हैं। दोनों पक्ष एक-दूसरे की प्रगति और पालन पर नजर रख सकते हैं।
3. भरोसा: दोनों पक्षों को भरोसा रहता है कि जब तक सभी शर्तें पूरी नहीं होतीं, पैसे जारी नहीं किए जाएंगे। इससे लॉन्ग टर्म और हाई-वैल्यू डील्स में भरोसा बढ़ता है।
4. कानूनी अनुपालन: एस्क्रो प्रक्रिया से यह सुनिश्चित होता है कि सभी कानूनी शर्तें पूरी हो रही हैं। टैक्स और बीमा जैसी चीजें एकमुश्त के बजाय मासिक आधार पर दी जा सकती हैं।
एस्क्रो के नुकसान
1. लागत: एस्क्रो फीस का सीधा असर मुनाफे पर पड़ सकता है। ऑनलाइन डील्स में यह फीस PayPal जैसे विकल्पों की तुलना में ज्यादा हो सकती है।
2. रकम में गड़बड़ी: रियल एस्टेट और टैक्स/बीमा भुगतान जैसे मामलों में कई बार एडवांस रकम का अनुमान गलत हो सकता है। इससे खाते में ज्यादा या कम पैसा जमा हो सकता है। यह बाद में वित्तीय असंतुलन या समायोजन की स्थिति ला सकती है।
3. खर्च बढ़ सकता है: एस्क्रो अकाउंट में टैक्स और बीमा भुगतान के लिए एडवांस रकम ली जाती है। बैंक सालाना अनुमान के आधार पर टैक्स और इंश्योरेंस की रकम को 12 महीनों में बांटकर EMI में जोड़ देता है। इसका मकसद समय पर भुगतान सुनिश्चित करना है, लेकिन इससे उधारकर्ता पर हर महीने अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
कौन चलाता है एस्क्रो अकाउंट्स
एस्क्रो अकाउंट्स का संचालन आमतौर पर बैंक, नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनियां (NBFCs) या अधिकृत एस्क्रो सेवा प्रोवाइडर करते हैं। ये एजेंसियां लेनदेन को निष्पक्ष रूप से मैनेज करती हैं और पैसे को तब तक सुरक्षित रखती हैं जब तक दोनों पक्ष अपने-अपने दायित्वों को पूरा नहीं कर लेते।