आपने ओबेरॉय ग्रुप ऑफ होटल का नाम सुना होगा लेकिन वह कैसे इतना बड़ा ब्रांड बन गया। ओबेरॉय होटल को कौन इतनी ऊंचाई पर लेकर इसके बार में जानते हैं? ओबेरॉय ग्रुप ऑफ होटल्स को इस ऊंचाई तक लाने के पीछे मोहन सिंह ओबेरॉय की मेहनत रही है। वह एक समय में डेस्क क्लर्क के तौर पर काम करते थे। विभाजन से पहले भारत के झेलम जिले जो अब पाकिस्तान में है, वहां उनका जन्म हुआ। वह एक सिख परिवार में जन्मे, ओबेरॉय को शुरुआत के समय में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। अपने पिता की असामयिक मृत्यु के बाद वह लाहौर में अपने चाचा के जूते के कारखाने में शामिल हो गए। हालांकि, दंगों ने इसे बंद करने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद वे एक नई शुरुआत की उम्मीद के साथ फ्रंट डेस्क क्लर्क के रूप में शिमला के सेसिल होटल में शामिल हो गए। उन्हें नहीं पता था कि यह भूमिका उनके भविष्य को आकार देगी।
मोहन सिंह ओबेरॉय के अपने सपने को पूरा करने की दिशा में पहली बार साल 1934 में उनकी पहली संपत्ति द क्लार्कस होटल को खरीदा। इसे खरीदने के लिए उन्होंने अपनी पत्नी के गहने और उनके पास मौजूद हर प्रॉपर्टी को गिरवी रख दिया। उन्हें अपनी सोच और विजन पर पूरा भरोसा था। उनकी कड़ी मेहनत ने जल्द ही परिणाम दिये और 5 सालों में उन्होंने 5 सालों में गिरवी रखे सामान की पेमेंट कर दी। इसके बाद ओबेरॉय ने कलकत्ता में ग्रैंड होटल खरीदा। उस समय हैजा महामारी फैलने के कारण इसकी खराब स्थिति थी। एक दूरदर्शी होटल व्यवसायी के रूप में मोहन सिंह ओबेरॉय की स्थिति को मजबूत करते हुए, यह परियोजना भी एक बड़ी सफलता साबित हुई।
होटल इंडस्ट्री में उनके विजन ने ही मोहन सिंह ओबेरॉय के जुनून ने उन्हें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होटल के बाद होटल का अधिग्रहण करने के लिए प्रेरित किया। ओबेरॉय समूह अब 31 शानदार होटल और रिसॉर्ट का मालिक है। वह अपनी लग्जरी और अपने मानदंडों के लिए जाना जाता है।
मोहन सिंह ओबेरॉय को भारतीय हॉस्पिटेलिटी इंडस्ट्री में उनके योगदान के लिए 2001 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। भारतीय होटल उद्योग के जनक के रूप में भी जाने जाने वाले, एमएस ओबेरॉय ने 2002 में अंतिम सांस ली, न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर बेस्ट होटल चेन की विरासत छोड़ गए। 12,700 करोड़ रुपये से अधिक के मार्केट वैल्यू के साथ कंपनी अपनी जगह बना चुकी है।