क्या होता है सर्किल रेट, इससे कैसे तय होती है प्रॉपर्टी की कीमत? जानिए हर एक डिटेल
सर्किल रेट प्रॉपर्टी खरीदते समय स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन खर्च और होम लोन पर असर डालता है। इसे समझे बिना प्रॉपर्टी खरीदना घाटे का सौदा हो सकता है, क्योंकि असली लागत इसी पर निर्भर करती है। जानिए पूरी डिटेल।
घर खरीदते समय ज्यादातर लोग लोकेशन, कीमत और बजट पर ध्यान देते हैं। लेकिन, एक चीज है जो अक्सर नजरअंदाज हो जाती है- सर्किल रेट। यही वह आंकड़ा है जो तय करता है कि आपकी प्रॉपर्टी पर कितना टैक्स लगेगा, रजिस्ट्रेशन में कितना खर्च आएगाष कई बार तो यह भी कि आपको कितना होम लोन मिलेगा।
दिलचस्प बात यह है कि भले ही आप कम कीमत पर डील करें, लेकिन सरकार सर्किल रेट के हिसाब से ही वैल्यू मानेगी। ऐसे में सर्किल रेट को समझे बिना प्रॉपर्टी खरीदना मतलब अधूरी जानकारी के साथ बड़ा फैसला लेना है।
सर्किल रेट क्या होता है?
सर्किल रेट वह न्यूनतम कीमत होती है, जिसे राज्य सरकार किसी इलाके में प्रॉपर्टी की खरीद-बिक्री के रजिस्ट्रेशन के लिए तय करती है। इसे रेडी रेकनर रेट भी कहा जाता है। प्रॉपर्टी की रजिस्ट्रेशन फीस और स्टांप ड्यूटी इसी रेट के आधार पर तय होती है।
आमतौर पर राज्य का रेवेन्यू विभाग सर्किल रेट को हर साल या 2-3 साल में अपडेट करता है, ताकि यह मौजूदा बाजार के हिसाब से बना रहे।
कैसे तय होता है सर्किल रेट?
सर्किल रेट तय करते समय सरकार कई चीजों को ध्यान में रखती है। आइए समझते हैं कि इसमें किन फैक्टर की अहम भूमिका रहती है।
लोकेशन सबसे बड़ा फैक्टर होता है। जहां बेहतर कनेक्टिविटी, अच्छी सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर होता है, वहां सर्किल रेट ज्यादा होता है।
प्रॉपर्टी का प्रकार भी मायने रखता है। रेजिडेंशियल, कमर्शियल और इंडस्ट्रियल प्रॉपर्टी के लिए अलग-अलग रेट तय होते हैं।
ओनरशिप यानी फ्रीहोल्ड और लीजहोल्ड प्रॉपर्टी का रेट अलग हो सकता है।
इसके अलावा आसपास की सुविधाएं, जैसे अस्पताल, स्कूल और बाजार की उपलब्धता भी रेट को प्रभावित करती है।
प्रॉपर्टी का साइज और उसकी उम्र भी अहम भूमिका निभाते हैं। छोटी या पुरानी प्रॉपर्टी का रेट अलग हो सकता है।
सर्किल रेट क्यों जरूरी है
सर्किल रेट को समय-समय पर इसलिए बदला जाता है ताकि यह रियल एस्टेट बाजार की सही तस्वीर दिखा सके। जहां डिमांड ज्यादा होती है, वहां रेट बढ़ जाता है और जहां कम होती है, वहां कम रहता है।
इसका एक और बड़ा मकसद यह भी है कि खरीदार और विक्रेता कम कीमत दिखाकर स्टांप ड्यूटी बचाने की कोशिश न कर सकें। इससे सरकार को सही राजस्व मिल पाता है।
सर्किल रेट कैसे काम करता है
अब मान लीजिए किसी प्रॉपर्टी की बाजार कीमत 50 करोड़ रुपये है, लेकिन सर्किल रेट के हिसाब से उसकी वैल्यू 1 करोड़ रुपये तय होती है। ऐसे में टैक्स और स्टांप ड्यूटी 1 करोड़ रुपये के आधार पर ही लगेगी।
इससे यह सुनिश्चित होता है कि लेन-देन में वास्तविक मूल्य छिपाया न जाए और सरकार को सही टैक्स मिले।
प्रॉपर्टी खरीदते समय सर्किल रेट क्यों अहम है
प्रॉपर्टी खरीदते समय सर्किल रेट जानना बहुत जरूरी होता है। क्योंकि कुल खर्च सिर्फ प्रॉपर्टी की कीमत नहीं होता, बल्कि स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस भी शामिल होती है, जो सर्किल रेट या डील वैल्यू में जो ज्यादा हो, उसके आधार पर तय होती है।
इसके जरिए आप यह भी समझ सकते हैं कि प्रॉपर्टी की कीमत सही है या ज्यादा/कम है, क्योंकि सर्किल रेट उस इलाके की न्यूनतम उचित कीमत बताता है।
सर्किल रेट का होम लोन पर असर
सर्किल रेट का सीधा असर आपके होम लोन पर पड़ता है। बैंक आमतौर पर सर्किल रेट से तय वैल्यू और असली कीमत में जो कम होती है, उसी के आधार पर लोन तय करते हैं। अगर किसी इलाके का सर्किल रेट कम है, तो आपकी लोन पात्रता भी कम हो सकती है। इसका मतलब है कि आपको ज्यादा डाउन पेमेंट करना पड़ सकता है।
साथ ही, बैंक और फाइनेंशियल संस्थाएं भी इसी आधार पर प्रॉपर्टी की वैल्यू आंकती हैं, जिससे आपकी होम लोन पात्रता तय होती है। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदने से पहले सर्किल रेट को समझना जरूरी है, ताकि आप सही बजट और फाइनेंशियल प्लानिंग कर सकें।