₹1.75 करोड़ का लोन बन गया ₹147 करोड़ की देनदारी! मस्क को भी कंगाल कर दे, ऐसा था ब्याज का हिसाब
एक व्यक्ति का ₹1.75 करोड़ का लोन था। यह कुछ ही साल में ₹147 करोड़ की देनदारी बन गया। हाई कोर्ट ने इस हैरान करने वाले कर्ज मामले में दोबारा सुनवाई का आदेश दिया है। जानिए कैसे इतना बढ़ गई लोन की रकम और क्यों जज ने इस पर सख्त टिप्पणी की।
कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया कि व्यक्ति को जुलाई 2016 में अपना घर बेचना पड़ा।
सिंगापुर में कर्ज का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ आम लोगों को बल्कि अदालत को भी हैरान कर दिया। एक व्यक्ति ने सिर्फ S$2.5 लाख (करीब ₹1.75 करोड़) का लोन लिया था, लेकिन समय के साथ यह रकम बढ़कर S$2.1 करोड़ (लगभग ₹147 करोड़) हो गई। इस मामले की जानकारी The Straits Times की रिपोर्ट में सामने आई है।
2010 में लिया गया लोन, शर्तें थीं बेहद सख्त
इस व्यक्ति ने साल 2010 में एक लाइसेंस प्राप्त मनीलेंडर से लोन लिया। लोन पर हर महीने 4% ब्याज तय था। अगर किस्त समय पर नहीं दी जाती, तो उस पर 8% मंथली लेट पेमेंट ब्याज लगता था। इसके अलावा, हर महीने S$2,500 का अलग से लेट-पेमेंट प्रोसेसिंग चार्ज भी लिया जाता था। इन शर्तों का मतलब था कि अगर जरा भी देरी हुई, तो कर्ज तेजी से बढ़ता चला जाएगा।
जैसे कि लोन का सालाना ब्याज 48% था। किस्त चूकने का मतलब था कि सालाना ब्याज बढ़कर 96% हो जाता। इसका मतलब कि अगर 1 करोड़ रुपये का लोन है, तो किस्त चूकने पर उसका 1 साल में ब्याज ही करीब 1 करोड़ रुपये हो जाता। मतलब था कि ब्याज का हिसाब ऐसा था कि लोन लेने के बाद कुछ साल में दुनिया के सबसे अमीर इंसान एलॉन मस्क भी कंगाल हो जाएं।
चार साल में ही कर्ज तीन मिलियन डॉलर पहुंचा
लगातार ब्याज, पेनल्टी और चार्ज जुड़ते रहे। नतीजा यह हुआ कि सिर्फ चार साल में कर्ज S$2.5 लाख से बढ़कर S$30 लाख पहुंच गया। यह रकम मूल लोन से कई गुना ज्यादा थी, लेकिन इसके बाद भी ब्याज और चार्ज रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
समय बीतने के साथ कंपाउंडिंग का असर और खतरनाक होता गया। साल 2021 तक यह कर्ज बढ़कर S$2.1 करोड़ हो चुका था। यानी एक छोटा सा लोन, सालों में बढ़ते-बढ़ते करोड़ों डॉलर की देनदारी बन गया।
कर्ज चुकाने के लिए घर तक बेचना पड़ा
कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया कि व्यक्ति को जुलाई 2016 में अपना घर बेचना पड़ा। उसने अपना S$20 लाख (करीब ₹14 करोड़) का घर उसी मनीलेंडिंग कंपनी के डायरेक्टर को बेच दिया। उसका मकसद बस इतना था कि उसके पांच सदस्यीय परिवार के सिर से छत न छिने।
घर बेचने के साथ एक और शर्त जुड़ी थी। व्यक्ति को उसी डायरेक्टर के साथ किरायेदारी का समझौता करना पड़ा। इसके तहत वह उसी घर में किराएदार बनकर रहने लगा और हर महीने ₹5 से ₹6 लाख किराया देने पर सहमत हुआ।
घर भी गया, कर्ज फिर भी बढ़ता रहा
घर की मालिकाना हक छोड़ने के बावजूद कर्ज कम नहीं हुआ। ब्याज और अन्य चार्ज की वजह से देनदारी लगातार बढ़ती रही। मामला तब खुलकर सामने आया जब किराया न देने पर विवाद हुआ और व्यक्ति ने वह घर खाली करने से इनकार कर दिया, जिसे वह पहले ही बेच चुका था।
हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी
जब मामला हाई कोर्ट पहुंचा, तो जज Philip Jeyeratnam ने इस कर्ज को लेकर कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ₹1.74 करोड़ का लोन ब्याज और फीस के जरिए 'दसियों मिलियन' में बदल जाना अंतरात्मा को झकझोर देने वाला है।
उधारकर्ता का कहना है कि किराए का समझौता सिर्फ दिखावा था। उसने आरोप लगाया कि लोन से जुड़े दस्तावेजों में धोखाधड़ी, छल और कानून के तहत तय जिम्मेदारियों का उल्लंघन हुआ है। अदालत ने माना कि लोन और घर बिक्री-दोनों ही मामलों में कई सवाल खड़े होते हैं।
अब दोबारा होगी पूरी सुनवाई
इन सभी हालात को देखते हुए अदालत ने रीट्रायल का आदेश दिया है। अब दोबारा यह जांच होगी कि क्या यह पूरा लेन-देन उन कानूनों का उल्लंघन करता है, जो लोगों को अत्यधिक ब्याज और सूदखोरी से बचाने के लिए बनाए गए हैं।
यह मामला इस बात की चेतावनी भी है कि कर्ज लेते समय उसकी शर्तों को समझना कितना जरूरी है, क्योंकि छोटी सी चूक सालों बाद भारी तबाही में बदल सकती है।