'पाकिस्तान के कहने पर रोका ईरान पर हमला', मुनीर और शहबाज शरीफ की जुगलबंदी ने पलटी बाजी!

Asim Munir-Shehbaz Sharif: ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उनसे ईरान के साथ सीजफायर बढ़ाने की अपील की थी। ट्रंप के इस फैसले से दुनिया में पाकिस्तान की छवि बदल रही है। जो देश कल तक 'खतरनाक' माना जाता था, उसे अब 'शांतिदूत' देखा जा रहा है

अपडेटेड Apr 22, 2026 पर 10:58 AM
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ट्रंप के इस कदम ने रातों-रात इस्लामाबाद को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है

Trump On Pakistan: मिडिल ईस्ट में मंडराते युद्ध के बादलों के बीच एक बड़ी खबर आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर होने वाले हमले को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया है। ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि यह फैसला उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व की गुजारिश पर लिया है। ट्रंप के इस कदम ने रातों-रात इस्लामाबाद को वैश्विक कूटनीति के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है।

'मुनीर और शरीफ के कहने पर रोका हमला'

डोनाल्ड ट्रंप ने 'Truth Social' पर पोस्ट कर पूरी दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उनसे ईरान के साथ सीजफायर बढ़ाने की अपील की थी। ट्रंप ने माना कि ईरानी नेतृत्व फिलहाल 'बिखरा हुआ' है और उन्हें एक ठोस शांति प्रस्ताव तैयार करने के लिए समय की जरूरत है।


पाकिस्तान के लिए यह 'मजबूरी' भी है और 'मौका' भी

पाकिस्तान का मध्यस्थ बनना केवल शौक नहीं, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था को बचाने की जरूरत है। पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए 'होर्मुज की खाड़ी' पर निर्भर है। युद्ध होने पर तेल की कीमतें आसमान छूतीं, जिससे पाकिस्तान का 'इंपोर्ट बिल' उसे दिवालिया कर सकता था। ईरान और पाकिस्तान की सीमाएं जुड़ी हुई हैं। ईरान में अस्थिरता का सीधा असर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की सुरक्षा पर पड़ता। पाकिस्तान में बड़ी शिया आबादी रहती है। ईरान के साथ युद्ध होने पर देश के अंदर सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का खतरा था।

'हाइब्रिड शासन' का कूटनीतिक जादू

जानकारों का मानना है कि आसिम मुनीर की रणनीतिक सोच और शहबाज शरीफ की कूटनीति ने मिलकर काम किया है। जनरल मुनीर के ट्रंप प्रशासन के साथ अच्छे संबंध पाकिस्तान के लिए 'ट्रंप कार्ड' साबित हुए। पाकिस्तान 1979 की क्रांति के बाद से ही वाशिंगटन में ईरानी हितों का प्रतिनिधित्व करता रहा है, जिससे दोनों देशों का उस पर भरोसा बना हुआ है।

क्या खोने और पाने का है डर?

पाकिस्तान की छवि दुनिया में बदल रही है। जो देश कल तक 'खतरनाक' माना जाता था, उसे अब 'शांतिदूत' देखा जा रहा है। इससे विदेशी निवेश और IMF से मदद मिलने में आसानी हो सकती है। वहीं अगर बातचीत नाकाम होती है, तो ठीकरा पाकिस्तान के सिर फूट सकता है। साथ ही ईरान को लग सकता है कि पाकिस्तान केवल अमेरिका के हितों के लिए काम कर रहा है।

भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?

भारत के लिए यह खबर मिली-जुली प्रतिक्रिया वाली है। पश्चिम एशिया में शांति रहने से कच्चे तेल की कीमतें स्थिर रहेंगी, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान का बढ़ता कद और सैन्य नेतृत्व की मजबूती भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकती है। इतिहास गवाह है कि जब भी पाकिस्तान की सेना मजबूत हुई है, भारत के साथ रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं।

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