US-Iran Talks: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच एक बार फिर कूटनीति की मेज सजने वाली है। पाकिस्तान के इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत के दूसरे दौर को लेकर उम्मीदें तो बहुत हैं, लेकिन जमीनी हकीकत उसके उलट दिख रही है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, जिन मुद्दों ने पहले दौर की बातचीत को नाकाम किया था, वे आज भी वैसे ही बरकरार हैं। आइए आपको बताते हैं ईरान और अमेरिका के बीच किन मुद्दों पर है टकराव और मिडिल की क्या है मौजूदा स्थिति।
1. ईरान का परमाणु कार्यक्रम
दोनों देशों के बीच बातचीत की सबसे बड़ी दीवार ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन पर कम से कम 20 साल का लंबा ब्रेक लगाए। वहीं तेहरान ने इस लंबे निलंबन को सिरे से खारिज कर दिया है। वह इस पर अधिकतम 5 साल के लिए ब्रेक देने को तैयार है। ईरान का कहना है कि उसे अंतरराष्ट्रीय नियमों से अलग हटकर 'स्पेशल केस' की तरह न देखा जाए। इसके साथ ही अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना संवर्धित यूरेनियम का भंडार सौंप दे, लेकिन ईरान इसे अपनी सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है और इसे देने को तैयार नहीं है।
2. पाबंदियां और समुद्री घेराबंदी
ईरान के लिए बातचीत का मतलब आर्थिक राहत को लेकर है। ईरान चाहता है कि विदेशों में फंसे उसके अरबों डॉलर तुरंत अनफ्रीज किए जाएं और आर्थिक पाबंदियां हटें। बातचीत के बीच भी अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों की नौसैनिक घेराबंदी कर रखी है। दबाव के इस माहौल में दोनों देशों के बीच भरोसे की भारी कमी है।
3. 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की चाबी
समुद्र के रास्ते होने वाला वैश्विक तेल व्यापार इस पूरी बातचीत का सबसे संवेदनशील हिस्सा है। होर्मुज फिलहाल इस युद्ध का चोकपॉइंट बना हुआ है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। ईरान ने इसे कभी खोलने तो कभी बंद करने के संकेत देकर पूरी दुनिया की धड़कनें बढ़ा रखी हैं। अगर होर्मुज से तेल का फ्लो रुकता है, तो पूरी दुनिया में ईंधन की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। यही वजह है कि अमेरिका इस मुद्दे पर जल्द से जल्द समाधान चाहता है।
इस्लामाबाद वार्ता: उम्मीद या सिर्फ दिखावा?
पाकिस्तान में होने वाली इस बातचीत को लेकर दोनों तरफ से विरोधाभासी संकेत मिल रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान जा रहा है। दूसरी तरफ ईरान ने आधिकारिक तौर पर अभी तक भागीदारी की पुष्टि नहीं की है। उनका कहना है कि जब तक अमेरिका दबाव बनाना बंद नहीं करता, सार्थक बातचीत संभव नहीं है। इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की शांति वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई थी। वैसे उसे 'महत्वपूर्ण' बताया गया था।
पहले दौर की वार्ता में क्या हुआ था?
इस्लामाबाद में हुई पहले दौर की वार्ता 20 घंटे से भी अधिक समय तक चली थी, जिसमें अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 20 साल के प्रतिबंध और यूरेनियम भंडार सौंपने की कड़ी शर्तें रखीं। हालांकि, ईरान ने इन मांगों को 'अन्यायपूर्ण' बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया और अमेरिका पर 'कूटनीतिक धोखेबाजी' का आरोप लगाया। तेहरान का तर्क था कि वाशिंगटन एक तरफ शांति की बात कर रहा है और दूसरी तरफ नौसैनिक नाकेबंदी कर ईरान की अर्थव्यवस्था का गला घोंट रहा है, जो कि पिछले समझौतों और सीजफायर की शर्तों का सीधा उल्लंघन है। ईरान ने स्पष्ट किया कि जब तक अमेरिका अपनी 'धौंस जमाने वाली नीति' बंद नहीं करता और उसके फ्रीज किए गए अरबों डॉलर वापस नहीं देता, तब तक किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर करना मुमकिन नहीं है।
युद्ध की क्या है मौजूदा स्थिति?
अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए है। बीते दिन अमेरिकी नौसेना ने होर्मुज में ब्लॉकेड तोड़ने के आरोप में एक ईरानी कार्गो जहाज पर हमला बोल दिया और फिर उसे अपने कब्जे में ले लिया। इसके जवाब में ईरान ने भी अमेरिकी युद्धपोतों पर ड्रोन हमलें किए। यानी एक तरफ शांति के लिए मेज सजाई जा रही है, तो दूसरी तरफ समुद्र में ड्रोन हमले और सैन्य तनाव जारी है।