Ajit Pawar: NCP, महायुति सरकार और पवार परिवार, अजित 'दादा' के जाने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या होगा असर?
Ajit Pawar Plance Crash Death: अजित पवार की बहुमुखी प्रतिभा इस बात से साफ होती है कि उन्होंने कितनी अलग-अलग स्थितियों में खुद को सहजता से ढाल लिया। उन्होंने पृथ्वीराज चव्हाण, उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के मंत्रिमंडलों में छह-छह कार्यकाल तक उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया
Ajit Pawar: NCP, महायुति सरकार और पवार परिवार, अजीत 'दादा' के जाने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या होगा असर?
अजित पवार, जिन्हें महाराष्ट्र की राजनीति में 'दादा' के नाम से जाना जाता था, एक ऐसे नेता थे जिनकी पकड़ प्रशासन और जमीनी राजनीति- दोनों पर बहुत मजबूत थी। उनके अचानक चले जाने से न केवल उनकी पार्टी बल्कि पूरे राज्य की राजनीतिक दिशा बदल सकती है। कई पीढ़ियों के लिए, अजित पवार के बिना महाराष्ट्र की राजनीतिक तस्वीर की कल्पना करना मुश्किल है। महाराष्ट्र के सबसे लंबे समय तक उपमुख्यमंत्री रहे पवार (लगातार नहीं) महाराष्ट्र के वैकल्पिक सत्ता केंद्रों में से एक थे। बुधवार को बारामती में विमान दुर्घटना में उनके निधन से महाराष्ट्र की राजनीति, और खासतौर से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुट अनिश्चितता के दौर में डूब गए हैं।
अजित पवार की बहुमुखी प्रतिभा इस बात से साफ होती है कि उन्होंने कितनी अलग-अलग स्थितियों में खुद को सहजता से ढाल लिया। उन्होंने पृथ्वीराज चव्हाण, उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के मंत्रिमंडलों में छह-छह कार्यकाल तक उपमुख्यमंत्री के रूप में काम किया।
NCP का उनका गुट, जिसके पास पार्टी का आधिकारिक लोगो और चिन्ह है, महाराष्ट्र की मौजूदा फडणवीस सरकार का हिस्सा है। अजित पवार का निधन उपमुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए हुआ। उनके जाने से महाराष्ट्र की सत्ता और विपक्षी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार की 1999 में बनाई NCP में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2023 में उन्होंने शरद पवार गुट से बगावत कर NDA सरकार के साथ हाथ मिला लिया, जिससे पार्टी में विभाजन हो गया। चुनाव आयोग के 2024 के फैसले से अजित गुट को पार्टी का नाम और घड़ी का सिंबल मिला, लेकिन मतदाताओं की स्वीकृति पर सवाल बने रहे।
2024 लोकसभा चुनावों में अजित गुट का प्रदर्शन खराब रहा, मात्र एक सीट मिली। हालांकि, विधानसभा चुनावों में उन्होंने 41 सीटें जीतकर शरद पवार के एनसीपी (SP) को बड़ा झटका दिया।
इसी महीने महाराष्ट्र निकाय चुनावों में दोनों गुटों ने गठबंधन किया, लेकिन पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में हार मिली। इससे विलय की अटकलें तेज हो गईं, NCP नेता सुनील तटकरे ने कहा कि विलय वार्ता हो सकती है, लेकिन हम NDA में रहेंगे।
NCP में उत्तराधिकार का संकट
अजित पवार की गैरमौजूदगी में उनके गुट के विधायक, सांसद और विधान पार्षद अनिश्चितता के शिकार हैं। बिना उनके नेतृत्व और वार्ताकौशल के ये नेता एकजुट रहेंगे, नया नेता चुनेंगे या शरद पवार के पास लौटेंगे? यह बड़ा सवाल है।
अजित के दो बेटे पार्थ और जय और उनकी पत्नी सुनेत्रा उनके परिवार में हैं। पार्थ 2019 में मावल से लोकसभा चुनाव हार चुके हैं और राजनीति में सक्रिय लेकिन प्रभावशाली नहीं। जय बिजनेस संभालते हैं, जबकि सुनेत्रा राज्यसभा सांसद और रणनीतिकार हैं, जो बारामती से लोकसभा हार चुकीं।
सुनेत्रा और पार्थ पर अजित पवार की विरासत संभालने का दबाव होगा, लेकिन शरद पवार की परछाईं चुनौती बनी रहेगी। शरद पवार ने राज्यसभा कार्यकाल के बाद संन्यास की घोषणा की है, ऐसे में सुप्रिया सुले दिल्ली में पार्टी का चेहरा हैं, जबकि अजित ग्रामीण महाराष्ट्र के जनाधार थे।
अगर ये दोनों गुट एक हो जाते, तो दिल्ली में सुप्रिया सुले पार्टी का चेहरा होतीं और अतीज राज्य और ग्रामीण राजनीति को संभालते। लेकिन अब पवार परिवार और NCP का क्या होगा, आगे देखना होगा।
अजित पवार की विमान दुर्घटना में मृत्यु के तुरंत बाद ये सवाल उठने लगे क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में NCP एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। NCP विधायकों और पार्टी का क्या होगा, इसका असर सत्ताधारी महायुति और राज्य की राजनीति की दिशा पर पड़ेगा।
महायुति गठबंधन पर असर
अजित गुट महायुति (बीजेपी, शिंदे शिवसेना और NCP) का हिस्सा है, जिसमें 41 विधायक हैं। उनकी मौत से गठबंधन अस्थिर हो सकता है, क्योंकि अजित लॉयलिस्ट NDA में रहना चाहेंगे, लेकिन शरद पवार गुट की ओर दबाव बढ़ेगा। महाराष्ट्र सरकार मजबूत है, लेकिन NCP के बिना संतुलन बिगड़ सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अजित को जननेता और गरीबों के सशक्तिकरण का प्रतीक बताया।
शिवसेना (UBT) की प्रियंका चतुर्वेदी ने उन्हें कड़ा मेहनती नेता कहा। संजय राउत ने पहले ही विलय की उम्मीद जताई थी।
भविष्य की संभावनाएं
दोनों NCP गुटों का विलय संभव लग रहा था, निकाय चुनाव इसका संकेत थे। अब अजित के बिना यह प्रक्रिया तेज हो सकती है या रुक भी सकती। बारामती जैसे क्षेत्रों में पवार परिवार का वर्चस्व चुनौतीपूर्ण होगा। महाराष्ट्र की राजनीति अब सालों के सबसे बड़े सवालों से जूझ रही है: नया डिप्टी सीएम कौन होगा? NCP विधायक किस ओर जाएंगे? और गठबंधन का भविष्य क्या होगा?
यह घटना न केवल पवार परिवार बल्कि पूरे राज्य की सत्ता संरचना को हिला देगी। राजनीतिक पर्यवेक्षक गौर से देख रहे हैं कि यह संकट कैसे सुलझेगा।
क्या फिर एक होगा पवार परिवार?
हाल के स्थानीय चुनावों (पिंपरी-चिंचवड़) में अजित और शरद पवार के बीच बढ़ती नजदीकियों ने संकेत दिए थे कि परिवार फिर से एक हो सकता है। अब उनकी मृत्यु के बाद, सुप्रिया सुले की भूमिका केंद्रीय हो सकती है। सुप्रिया सुले को दिल्ली का चेहरा माना जाता है, जबकि अजित पवार महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति के धुरंधर थे। उनके जाने से बारामती के गढ़ को संभालने की जिम्मेदारी अब रोहित पवार या सुप्रिया सुले पर आ सकती है।
महाराष्ट्र की राजनीति पर प्रभाव
अजित पवार 6 बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री रहे। वे सुबह 6 बजे से काम शुरू करने वाले इकलौते नेता माने जाते थे। उनके निधन से महाराष्ट्र ने एक ऐसा 'मैनेजर' खो दिया है, जो जटिल राजनीतिक गठबंधनों को सुचारू रूप से चलाने की क्षमता रखता था।
आगामी समय में, उनकी रिक्त हुई सीट और पार्टी के भविष्य पर होने वाले फैसले यह तय करेंगे कि महाराष्ट्र की सत्ता की कमान किसके हाथ में रहेगी। फिलहाल, राज्य में 3 दिन के राजकीय शोक की घोषणा की गई है और पूरी राजनीति 'दादा' को अंतिम विदाई देने में डूबी है।
अजित पवार का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र की उस 'पावर पॉलिटिक्स' का अंत है, जहां एक व्यक्ति अपनी इच्छाशक्ति से सरकारें बना और गिरा सकता था। अब देखना यह होगा कि उनकी राजनीतिक विरासत को कौन संभालता है।