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जब नंदा देवी पर खोई US की न्यूक्लियर डिवाइस, 60 साल पुरानी कहानी जान दंग रह जाएंगे

Nanda Devi Mystery : दरअसल, 1964 में चीन ने अपना पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया था। चीन के हाथ परमाणु शक्ति देख अमेरिका अलर्ट हो गया। इसके बाद अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर एक सीक्रेट मिशन की योजना बनाई। 1962 के युद्ध और चीन से देश की सुरक्षा को देखते हुए भारत भी अमेरिका का साथ देने को राजी हो गया

MoneyControl Newsअपडेटेड Dec 14, 2025 पर 4:53 PM
जब नंदा देवी पर खोई US की न्यूक्लियर डिवाइस, 60 साल पुरानी कहानी जान दंग रह जाएंगे
कोल्ड बॉर के दौर के एक बेहद सिक्रेट ऑपरेशन का खुलासा फिर से हुआ है।

न्यूयॉर्क टाइम्स की हाल की एक रिपोर्ट में कोल्ड बॉर के दौर के एक बेहद सीक्रेट ऑपरेशन का खुलासा फिर से हुआ है। अमेरिका ने 1960 के दशक में भारत के साथ मिलकर चीन के परमाणु परीक्षणों और मिसाइल फायरिंग की जासूसी करने के लिए हिमालय में न्यूक्लियर-पावर्ड मॉनिटरिंग डिवाइस लगाए थे। भारत की सबसे ऊंची हिमालयी चोटियों में से एक नंदा देवी पर लगाया गया ये न्यूक्लियर-पावर्ड मॉनिटरिंग डिवाइस अचानक गायब हो गया था। 50 से भी ज़्यादा साल बीत जाने और नंदा देवी पर कई तलाशी अभियानों के बाद आज तक कोई नहीं जानता कि उन कैप्सूल के साथ क्या हुआ।

दरअसल, 1964 में चीन ने अपना पहला न्यूक्लियर टेस्ट किया था। चीन के हाथ परमाणु शक्ति देख अमेरिका अलर्ट हो गया। इसके बाद अमेरिका ने भारत के साथ मिलकर एक सीक्रेट मिशन की योजना बनाई। 1962 के युद्ध और चीन से देश की सुरक्षा को देखते हुए भारत भी अमेरिका का साथ देने को राजी हो गया।

चीन के परमाणु परीक्षण के बाद शुरू हुआ सीक्रेट मिशन

1964 में चीन ने शिनजियांग में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया। इससे अमेरिका और भारत दोनों की चिंता बढ़ गई। चीन के अंदर खुफिया जानकारी जुटाने में दिक्कत होने के कारण CIA ने एक अलग तरह की योजना बनाई। इसका मकसद हिमालय की ऊंची चोटियों पर एक निगरानी स्टेशन लगाकर चीन की मिसाइल गतिविधियों पर नजर रखना था। इसके लिए नंदा देवी को चुना गया, जो भारत की चीन सीमा के पास स्थित 25,645 फीट ऊंची चोटी है। इस मिशन में एक खास उपकरण लगाया जाना था, जिसमें प्लूटोनियम से चलने वाला पोर्टेबल परमाणु जनरेटर शामिल था। इसमें इतना प्लूटोनियम था, जो नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम में इस्तेमाल हुए प्लूटोनियम का लगभग एक तिहाई था। यह उपकरण कई सालों तक बिना देखरेख के काम करने के लिए बनाया गया था।

इस मिशन को एक वैज्ञानिक अभियान का रूप दिया गया। इसमें अमेरिकी पर्वतारोहियों के साथ भारतीय खुफिया एजेंसियों से जुड़े पर्वतारोहियों को भी शामिल किया गया, ताकि किसी को असली मकसद पर शक न हो।

अगर असंभव नहीं, तो बेहद मुश्किल’

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