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Shahid Diwas: 1993 फायरिंग और शहीद दिवस की पुरानी फाइलें बंगाल में निकलीं, जानिए ममता की पॉलिटिक्स का इससे कैसा कनेक्शन

Shahid Diwas: पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जाने वाले ‘शहीद दिवस’ का आयोजन मंगलवार 21 जुलाई को एक अभूतपूर्व दौर में पहुंच गया, जब तीन प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक खेमे मध्य कोलकाता में महज ढाई किलोमीटर के दायरे में एक समान कार्यक्रम आयोजित करने जा रहे हैं

Akhilesh Nath Tripathiअपडेटेड Jul 21, 2026 पर 2:48 PM
Shahid Diwas: 1993 फायरिंग और शहीद दिवस की पुरानी फाइलें बंगाल में निकलीं, जानिए ममता की पॉलिटिक्स का इससे कैसा कनेक्शन
Shahid Diwas: बंगाल में शहीद दिवस राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने की प्रतिस्पर्धा में बदल गया है

Shahid Diwas: पश्चिम बंगाल की राजनीति में दशकों पुराने और बेहद संवेदनशील मुद्दों को लेकर एक बड़ा सियासी तूफान खड़ा हो गया है। राज्य की भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के शासनकाल और अतीत से जुड़ी कई राजनीतिक रूप से संवेदनशील फाइलों और मामलों को फिर से पटल पर ला दिया है। सरकार का दावा है कि ये कदम जवाबदेही तय करने के लिए उठाए जा रहे हैं जबकि टीएमसी ने इसे राजनीतिक बदला करार दिया है। इसी कड़ी में सबसे बड़ा फैसला 21 जुलाई 1993 की पुलिस फायरिंग से जुड़े जस्टिस सुशांत कुमार चटर्जी आयोग की रिपोर्ट को विधानसभा में पेश करना है।

आइए समझते हैं 1993 की इस घटना का ममता बनर्जी की राजनीति से क्या कनेक्शन है, आयोग की रिपोर्ट में क्या खुलासे हुए हैं और बंगाल सरकार ने किन-किन अन्य मामलों पर शिकंजा कसने की तैयारी की है।

1993 की फायरिंग और ममता बनर्जी की राजनीति का कनेक्शन

21 जुलाई 1993 की घटना का पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक बहुत खास स्थान है। 1993 में ममता बनर्जी स्टेट यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष हुआ करती थीं। उन्होंने फोटो वोटर पहचान पत्र लागू करने की मांग को लेकर राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग्स की ओर एक विरोध मार्च का नेतृत्व किया था। प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने मायो रोड, दोरीना क्रॉसिंग और एस्प्लेनेड ईस्ट सहित कई स्थानों पर गोलियां चलाईं। इसमें 13 युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौत हो गई थी।

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