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इस्लाम में बच्चों की पैरेंटिंग के लिए 7-7-7 का रूल अपनाते हैं, क्या इस थ्योरी के बारे में जानते हैं आप?

The 7-7-7 Rule of Parenting एक ऐसा सरल और प्रभावी तरीका माना जाता है, जिसे कई लोग बच्चों की परवरिश के लिए बेहद उपयोगी समझते हैं। इस नियम के अनुसार बच्चों की परवरिश को अलग-अलग उम्र के चरणों में बांटा जाता है, जिससे उन्हें सही दिशा, बेहतर समझ और संतुलित विकास मिल सके

Edited By: Anchal Jhaअपडेटेड May 18, 2026 पर 3:37 PM
इस्लाम में बच्चों की पैरेंटिंग के लिए 7-7-7 का रूल अपनाते हैं, क्या इस थ्योरी के बारे में जानते हैं आप?
The 7-7-7 Rule of Parenting: हर बच्चा अलग होता है और हर उम्र की जरूरतें भी अलग होती हैं।

इस्लाम में बच्चों की परवरिश को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि बच्चे परिवार और समाज का भविष्य होते हैं, इसलिए उनकी सही देखभाल जरूरी है। इस्लामी शिक्षाओं में हजरत अली से जुड़ी 7-7-7 पैरेंटिंग थ्योरी को काफी असरदार माना जाता है। इसमें बच्चे की पूरी परवरिश को तीन हिस्सों में बांटा गया है, हर हिस्सा 7 साल का होता है। पहले 7 साल में बच्चे को प्यार, खेल और देखभाल दी जाती है। अगले 7 साल में उसे अच्छे संस्कार, अनुशासन और सही-गलत की समझ सिखाई जाती है। और आखिरी 7 साल में माता-पिता उसे समझदारी से गाइड करते हैं, जैसे एक दोस्त और सलाहकार की तरह। ये तरीका बच्चों को अच्छा इंसान बनाने में मदद करता है।

पहले 7 साल

0 से 7 साल की उम्र बच्चों के दिमागी और भावनात्मक विकास के लिए सबसे खास मानी जाती है। इस दौरान बच्चे किताबों से कम और खेल, कहानियों व आसपास के माहौल से ज्यादा सीखते हैं।

इस उम्र में माता-पिता को बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताना चाहिए। उनके साथ खेलना, बातें करना और नई चीजें सिखाना बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाता है। जब बच्चा प्यार और सुरक्षा महसूस करता है, तो उसकी सीखने की क्षमता भी मजबूत होती है।

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