कैपिटल गेंस टैक्स (Capital Gains Tax) के नियमों में अभी कई कमियां हैं। लंबे समय से इन कमियों को दूर करने की मांग हो रही है। सवाल है कि क्या वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) कैपिटल गेंस टैक्स के जुड़े नियमों में बजट में बदलाव करेंगी। वित्त मंत्री 1 फरवरी को यूनियन बजट पेश करेंगी। यह कैपिटल गेंस टैक्स नियम से जुड़ी कमियों को दूर करने का सही मौका हो सकता है। आइए कैपिटल गेंस टैक्स के मौजूदा नियम और उनकी कमियों के बारे में विस्तार से जानते हैं।
अभी अलग-अलग एसेट के लिए कैपिटल गेंस टैक्स के नियम अलग-अलग हैं। कुछ मामलों में तो एक ही एसेट क्लास के अलग-अलग प्रोडक्ट्स के लिए अलग-अलग नियम हैं। इससे निवेशकों को काफी उलझन होती है। उनके लिए इन अलग-अलग नियमों को याद रखना मुमकिन नहीं होता। इस वजह से कई बार उन्हें अनुमान के मुकाबले ज्यादा टैक्स चुकाने को मजबूर होना पड़ता है। अगर इन नियमों को तर्कसंगत बनाया जाता है तो इससे निवेशकों को काफी आसानी होगी।
लिस्टेड बॉन्ड (Bond) को 12 महीने से ज्यादा समय तक रखने पर आपको लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (Long Term Capital Gains) चुकाना पड़ता है। इसका रेट 10 फीसदी है। लेकिन, डेट म्यूचुअल फंड (Debt Mutual Fund) के मामले में नियम अलग है। अगर आप डेट म्यूचुअल फंड को तीन साल से ज्यादा वक्त तक रखते हैं तो आपको लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (LTCG) टैक्स चुकाना पड़ता है। इसका रेट 20 फीसदी (इंडेक्सेशन के साथ) है। अगर आप तीन साल से पहले डेट म्यूचुअल फंड को बेचते हैं तो आपको शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस टैक्स (STCG) चुकाना पड़ता है। इसका टैक्स रेस आपके इनकम टैक्स स्लैब के मुताबिक होगा।
टैक्स एक्सपर्ट का कहना है कि एसेट पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (LTCG) के लिए उसे रखने की अवधि को तर्कसंगत बनाना जरूरी है। एसेट के लिए शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस पर टैक्स की अवधि के नियम में ज्यादा फर्क नहीं होना चाहिए। समस्या सिर्फ अवधि की ही नहीं है। एक ही एसेट क्लास में टैक्स रेट्स अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, शेयर और इक्विटी म्यूचुअल फंड्स (Equity Mutual Funds) पर एसटीसीजी रेट 15 फीसदी है। बॉन्ड और बॉन्ड फंड्स (Bond Funds) के मामले में एसटीसीजी टैक्स के लिए रेट टैक्सपेयर्स की इनकम टैक्स स्लैब पर निर्भर करता है। ज्यादा इनकम वाले लोगों के लिए यह 30 फीसदी तक पहुंच जाता है।
डेलॉयट के पार्टनर राजेश गांधी कहते हैं, "बॉन्ड्स और गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट को बढ़ावा देने की जरूरत है। खासकर रिटेल इन्वेस्टर्स को इनमें निवेश के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। कई इन्वेस्टर्स लंबी अवधि के लिए लिस्टेड बॉन्ड्स खरीदते हैं। लेकिन, कई बार जब वे एक साल के अंदर इन्हें बेचते हैं तो उन्हें अपनी टैक्स स्लैब के मुताबिक इन पर शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस टैक्स चुकाना पड़ता है। इक्विटी की तरह इसे घटाकर 15 फीसदी करने की जरूरत है।"
अनलिस्टेड बॉन्ड्स और डेट म्यूचुअल फंड्स में इन्वेस्टमेंट को भी 12 महीने से ज्यादा वक्त तक रखने पर इसे लॉन्ग टर्म माना जाना चाहिए। इक्विटी के मामले में यह 12 महीने से ज्यादा है। एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया (Association of Mutual Funds in India) यानी एंफी (AMFI) ने नॉन-इक्विटी ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स जो अपना 65 फीसदी या ज्यादा एसेट लिस्टेड डेट सिक्योरिटीज में इन्वेस्ट करते हैं, उनमें 12 महीने से ज्यादा वक्त तक के निवेश को लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस मानने की गुजारिश की है।
रियल एस्टेट में निवेश से जुड़े कैपिटल गेंस टैक्स के नियमों में भी बदलाव करने की जरूरत है। मुंबई के चार्टर्ड अकाउंटेंट बलवंत जैन का कहना है कि अगर रियल एस्टेट को 60 महीने के बाद बेचा जाता है तो इसे लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस माना जाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि रियल एस्टेट में निवेश लंबी अवधि के नजरिए से किया जाता है। डेट में निवेश को 12 महीने से ज्यादा वक्त तक रखने पर इसे लॉन्ग टर्म माना जाना चाहिए।