अखिलेश्वर सहाय
अखिलेश्वर सहाय
Union Budget 2023: साल 2017 में रेल बजट को यूनियन बजट में मिला दिया गया था। तब से रेलवे के बारे में यूनियन बजट में ही ऐलान किए जाते हैं। इससे रेलवे और उसकी योजनाओं का जिक्र बहुत कम होता है। इस बार भी यह स्थिति रही। वित्तमंत्री ने सिर्फ एक लाइन में यह ऐलान कर रेलवे के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी कि अगले फाइनेंशियल ईयर के लिए रेलवे के लिए 2.40 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया जा रहा है। यह भी बताया गया कि फाइनेंशियल ईयर 2013-14 के मुकाबले यह आवंटन 9 गुना है।
जब बात रेलवे की होती है तो यूनियन बजट में ज्यादा कुछ नहीं कहा जाता है। इसके लिए आपको ध्यान से बजट डॉक्युमेंट्स को देखना पड़ता है। बजट डॉक्युमेंट्स को ध्यान से देखने के बाद रेलवे के बारे में मुझे जो चीजें नजर आई हैं, उनके बारे में मैं बता रहा हूं।
रेलवे के लिए किराया बढ़ाने की गुंजाइश नहीं
इंडियन रेलवेज को पैसेंजर्स, गुड्स और दूसरे सभी स्रोतों से होने वाली आय अगले फाइनेंशियल ईयर में 2.65 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। इसके मुकाबले इस फाइनेंशियल ईयर में रेलवे की आमदनी का संशोधित अनुमान 2.43 लाख करोड़ रुपये है। रेलवे को चलाने में फ्रेट रेवेन्यू का बड़ा हाथ होता है। इसके 1.75 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान जताया गया है। पैसेंजर और दूसरे तरह के सभी रेवेन्यू 77,000 करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है। यहां रेलवे के लिए एक बड़ी उलझन की स्थिति दिखती है। हवाई सेवाओं और एसी बसों की वजह से रेलवे के यात्रियों की संख्या में कमी आ रही है। इसलिए यह यात्री किराया बढ़ाने की स्थिति में नहीं है।
पहले से ही रेलवे पर ज्यादा खर्च का दबाव
दूसरा, इंडियन रेलवे जिस अकाउंटिंग सिस्टम का इस्तेमाल करता है, उसके हिसाब से अगले फाइनेंशियल ईयर में इसका वर्किंग एक्सपेंसेज 2.60 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह सभी स्रोतों से मिलने वाली आय के करीब बराबर है।
इससे रेलवे की स्थिति बहुत नाजुक हो जाती है। एक तरह से यह ICU में है। तेजी से बढ़ते पांच सबसे बड़े खर्च रेलवे पर भारी पड़ रहे हैं। पहला है स्टाफ पर होने वाला खर्च जो 1.05 लाख करोड़ रुपये है। दूसरा है पेंशन पर होने वाला खर्च जो 62,000 रुपये है। IRFC से लीज पर लिए गए रोलिंग स्टॉक का खर्च 23,782 करोड़ रुपये है। ट्रैक्शन एनर्जी खर्च 20.5 लाख करोड़ है, जबकि डीजल पर होने वाला खर्च 14,358 करोड़ रुपये है।
इससे इंडियन रेलवे का ऑपरेटिंग रेशियो करीब 100 पर पहुंच जाता है। इसका मतलब है कि 1 रुपये कमाने के लिए रेलवे को 1 रुपये खर्च करना पड़ता है। यह स्थिति बहुत गंभीर है।
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अगले फाइनेंशियल ईयर यानी 2023-24 में बजट में रेलवे का कुल कैपिटल एक्सपेंडिचर एसेट्स के एक्विजिशन, कंस्ट्रक्शन और रिप्लेसमेंट आदि पर रिकॉर्ड 2.6 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान जताया गया है। इसमें से 2.4 लाख करोड़ रुपये बजटरी सपोर्ट के रूप में मिलेंगे। 3,000 करोड़ रुपये रेलवे के अपने आंतरिक संसाधनों से मिलेंगे। 200 करोड़ रुपये निर्भय फंड से आएंगे। 17,000 करोड़ रुपये इनटर्नल एंड एक्सटर्नल बजटरी रिसोर्सेज (IEBR) से आएंगे। अगर फेस वैल्यू के लिहाज से देखा जाए तो यह इंडियन रेलवे के लिए सबसे बड़ा सालाना पूंजीगत खर्च होगा।
पांचवां, चीजों को गहराई में देखने पर अगले फाइनेंशियल ईयर के लिए आवंटित सालाना पूंजीगत खर्च बहुत अच्छी तस्वीर पेश नहीं करता है। ट्रैफिक फैसिलिटीज और कस्टमर अमेनिटीज पर कुल खर्च 16,000 करोड़ रुपये से कम है। इसी तरह इंफ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से नई लाइनों के लिए 31,200 करोड़ रुपये, लाइन के दोहरीकरण के लिए 31,000 करोड़, गेज कनवर्जन के लिए 4,600 करोड़ रुपये और ट्रैक रिन्यूएल के लिए सिर्फ 17,000 रुपये का प्रावधान किया गया है।
ध्यान से देखने पर समझ में आती है मुश्किल
गहराई में जाने पर असल मुश्किल सामने आती है। सबसे ज्यादा 56,000 करोड़ रुपये मैन्युफैक्चरिंग सस्पेंस के लिए चला जाता है। 30,000 करोड़ रुपये स्टोर सस्पेंस के लिए है। रेलवे का पूर्व फाइनेंस ऑफिसर होने के नाते मुझे इस कैपिटल एक्सपेंडिचर का मतलब समझ में नहीं आ रहा। 38,000 करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा रोलिंग स्टॉक पर चला जाएगा। अगर वंदे भारत ट्रेनों की संख्या बढ़ाने की योजना पूरी करनी है तो इससे काफी ज्यादा पैसे की जरूरत होगी।
बजट में रिसर्च के लिए कितने पैसे दिए गए हैं? रेलवे नेटवर्क के लिए सिर्फ 61 करोड़ रुपये दिए गए हैं, जो बहुत कम हैं। लेकिन, रेलवे की सोच बहुत ऊंची है। यह नई जेनरेशन वंदे भारत ट्रेनों की संख्या बढ़ाना चाहती है। हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों का इस्तेमाल करना चाहती है। विश्वस्तरीय रेलवे स्टेशंस चाहता है और ज्यादा क्षमता वाले इंजन चाहता है। इंडियन रेलवे की ट्रैक स्पीड की लिमिट बढ़ाकर 160 किलोमीटर प्रति घंटे के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। यहां तक कि हाई स्पीड पैसेंजर ट्रेनों और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का कोई जिक्र नहीं है।
2.4 लाख करोड़ रुपये का कैपिटल आउटले एक स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन, मुझे लगता है कि इंडियन रेलवे के लिए दिल्ली दूर है। इसे योजनाओं को सही तरह से पूरा करना होगा। समय के मामले में रिकॉर्ड ठीक करना होगा। तय बजट में योजनाएं पूरी करनी होंगी। इसके बाद ही यह देश की जीवनरेखा फिर से बन सकेगी।
(अखिलेश्वर सहाय, प्रेसिडेंट (एडवायजरी सर्विसेज), बीएआरएसवाईएल। यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार है। ये पब्लिकेशन के विचार नहीं हैं।)
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