Budget 2024-25: सरकारी बैंकों के प्राइवेटाइजेशन के लिए इससे अच्छा वक्त नहीं हो सकता

Union budget 2024: कई सालों के बाद सरकारी बैंकों की सेहत में सुधार आया है। उनके पास पर्याप्त पूंजी है। उनका डूब कर्ज घटकर काफी कम रह गया है। लोन की डिमांड स्ट्रॉन्ग है। सरकारी बैंकों के शेयरों में पिछले एक साल में जबर्दस्त तेजी आई है

अपडेटेड Jul 05, 2024 पर 3:43 PM
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इनवेस्टर्स सरकारी बैंकों में निवेश करने में कई वजहों से दूरी बनाते रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह एंप्लॉयीज ट्रेड यूनियन का दबदबा है।

पिछले कुछ सालों में यूनियन बजट में बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़े ऐलान नहीं हुए हैं। अगर कृषि लोन के सालाना टारगेट और लोन स्कीम में छोटे-मोटे बदलाव को छोड़ दें तो बजट में बैंकिंग रिफॉर्म्स करीब गायब रहा है। बैंकिंग सेक्टर में अंतिम रिफॉर्म 20216 में हुआ था, जब सरकार ने इनसॉल्वेसी एंड बैंकरप्सी कोड पेश किया था। केंद्र की नई एनडीए सरकार के पास इस बार बजट में बड़े रिफॉर्म्स के लिए मौका है। वह सरकारी बैंकों के प्राइवेटाइजेशन पर फोकस बढ़ा सकती है। केंद्र की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पहले कम से कम दो सरकारी बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी घटाने के संकेत दे चुकी है।

कई सरकारी बैंकों में सरकार की आधा से ज्यादा हिस्सेदारी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 2022 में कहा था कि बिजनेस चलाना सरकार का काम नहीं है। इसके बावजूद कई सरकारी बैंकों (PSU Banks) में सरकार की हिस्सेदारी आज 57-98 फीसदी के बीच है। बार-बार वादा करने के बाद सरकार 2019-20 में सिर्फ 10 सरकारी बैंकों का विलय कर सकी। 2019 में ही उसने लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (LIC) को IDBI Bank को खरीदने के लिए कहा। अब समय आ गया है सरकारी बैंकों के प्राइवेटाइजेशन पर फोकस बढ़ाने का।


विलय की जगह निजीकरण पर फोकस करने की जरूरत

कुछ दिन पहले एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि सरकार फिर से कुछ सरकारी बैंकों के विलय के बारे में सोच रही है। इसमें यूको बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, पंजाब एंड सिंध बैंक और Central Bank of India शामिल होंगे। अगर सरकार बैंकिंग सेक्टर में रिफॉर्म्स को लेकर गंभीर है तो उसे कई बैंकों का विलय करने की जगह कम से कम कुछ बैंकों का निजीकरण करना होगा। विलय में बैंकों को नई पूंजी नहीं मिलती है। न ही उनके वर्क कल्चर में बदलाव आता है।

सरकारी बैंकों की सेहत अच्छी

बैंकों का बैड लोन अब एक दशक से ज्यादा समय के सबसे निचले स्तर पर आ गया है। बैंकों का ग्रॉस नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (GNPA) रेशियो घटकर मार्च 2024 में 2.8 फीसदी पर आ गया, जो 12 साल में सबसे कम है। यह जानकारी RBI की जून की फाइनेंशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट (FSR) पर आधारित है। शिड्यूल्ड कमर्शियल बैंकों का NNPA इस साल मार्च के अंत में घटकर 0.6 फीसदी पर आ गया।

राइट-ऑफ के बाद सुधरी है बैंक की स्थिति

एसेट क्वालिटी में इतना ज्यादा इम्प्रूवमेंट कोई चमत्कार नहीं है। इसकी वजह बड़े पैमाने पर राइट-ऑफ है। RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल में केंद्रीय बैंक ने 2015 में एसेट क्वालिटी की समीक्षा करनी शुरू की थी। इससे बैंकों को अपने डूबे कर्ज के बारे में बताने को मजबूर होना पड़ा, जिसे उन्होंने लंबे समय से छुपा रखा था। लेकिन, अगर लंबी अवधि में इकोनॉमी की प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है तो फिर से NPA के मामले में स्थिति उलट सकती है। खासकर इंडिविजुअल्स और छोटी कंपनियों के मामले में इसका ज्यादा डर है।

बैंकों को जल्द नई पूंजी की जरूरत नहीं

इस साल मार्च अंत तक के उपलब्ध डेटा के मुताबिक, सभी 12 सरकारी बैंकों का कैपिटल एडेक्वेसी रेशियो (CAR) 15 फीसदी से ज्यादा है। यह 12 फीसदी के अनिवार्य न्यूनतम लेवल से काफी ज्यादा है। यहां तक कि UCO (16.98), Punjab & Sind (17.16) Bank of Maharashtra (17.38) जैसे छोटे बैंकों की स्थिति भी काफी अच्छी है। इसका मतलब है कि सरकार या किसी नए इनवेस्टर को इन बैंकों में तुरंत पूंजी डालने की जरूरत नहीं है।

क्रेडिट ग्रोथ स्ट्रॉन्ग बनी हुई है

पिछले कुछ सालों में बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ अच्छी रही है। केयर रेटिंग्स के डेटाके मुताबिक, बैंकों का ग्रॉस क्रेडिट ऑफटेक मई में 16.1 फीसदी बढ़ा है। यह साल दर साल आधार पर 0.70 फीसदी ज्यादा है। ज्यादातर सरकारी बैंकों के शेयरों में पिछले एक साल में तेजी देखने को मिली है। इस दौरान PSU Bank Index 67.2 फीसदी बढ़ा है। निवेशकों ने सरकारी बैंकों के शेयरों को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई है। ऐसे में यह सरकार के लिए सरकारी बैंकों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर अच्छा पैसा हासिल करने का सही वक्त है।

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मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी

सरकारी बैंकों के निजीकरण के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति जरूरी है। उधर, अच्छी बैलेंसशीट के बावजूद सरकारी बैंकों के लिए खरीदार की तलाश करना आसान नहीं है। इनवेस्टर्स सरकारी बैंकों में निवेश करने में कई वजहों से दूरी बनाते रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह एंप्लॉयीज ट्रेड यूनियन का दबदबा है। इन ट्रेड यूनियंस को नियंत्रण में रखने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति जरूरी है। अभी सरकार बैंकों का वर्क कल्चर न्यू एज प्राइवेट बैंकों से अलग है। इन सभी के बावजूद मोदी सरकार के लिए बैंकों के निजीकरण के लिए इससे अच्छा वक्त नहीं हो सकता है।

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