मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड (Maruti Suzuki India Limited) को हाल ही में आयकर विभाग (Income Tax Department) की ओर से 2,159.70 करोड़ रुपये का ड्राफ्ट असेसमेंट ऑर्डर मिला है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस ऑर्डर के खिलाफ कंपनी को दो से पांच साल तक मुकदमा लड़ना पड़ सकता है। लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि अगर डिस्प्यूट रिजॉल्यूशन पैनल (DRP) मारुति सुजुकी के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो इस मुद्दे को पहले भी हल किया जा सकता है। मारुति सुजुकी इंडिया ने शेयर बाजारों को दी गई सूचना में कहा था कि यह ड्राफ्ट असेसमेंट ऑर्डर वित्त वर्ष 2019-20 के लिए है, जहां इनकम टैक्स रिटर्न में बताई इनकम के मुकाबले 2159.70 करोड़ का अंतर बताया गया है।
जब आयकर विभाग का असेसिंग ऑफिसर, असेसी द्वारा फाइल किए गए रिटर्न में मौजूद इनकम या लॉस में कोई गड़बड़ी पाता है, तो वह असेसी यानी रिटर्न फाइल करने वाली यूनिट की आपत्ति या मंजूरी हासिल करने के लिए ड्राफ्ट असेसमेंट ऑर्डर का प्रस्ताव करता है। करदाता या तो असेसिंग ऑफिसर के समक्ष दावे का विरोध दर्ज कर सकता है या फिर DRP को अपील कर सकता है। अगर करदाता DRP का दरवाजा खटखटाता है तो उसे 9 माह में फैसला देना होता है। कंपनी का इरादा DRP के समक्ष आपत्तियां दाखिल करने का है। मारुति ने भरोसा दिलाया है कि इस आदेश का उसके फाइनेंस, ऑपरेशंस या अन्य गतिविधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
बीटीजी लीगल के पार्टनर अमित जैन का कहना है कि इस पैनल से राहत की उम्मीदें अधिक नहीं हैं। इस तरह के हाई-वैल्यू एडजस्टमेंट्स केवल टैक्स ट्रिब्यूनल या हाई कोर्ट लेवल पर ही अंतिम अंजाम तक पहुंच सकते हैं और इसमें कम से कम दो से पांच साल लग सकते हैं। अगर मामले को मारुति सुजुकी या कर अधिकारी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है, तो इसमें तीन से चार साल और लग सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड श्याम गोपाल के मुताबिक, 'DRP के लिए अपने निर्देश जारी करने के लिए नौ महीने की समय सीमा है। DRP के फैसले, पैनल का हिस्सा बनने वाले कमिश्नर्स के बहुमत वाली राय पर बेस्ड होते हैं। DRP द्वारा जारी निर्देश, असेसिंग अधिकारी के लिए बाध्यकारी हैं और अधिकारियों की ओर से इसके खिलाफ अपील नहीं की जा सकती है।' गोपाल ने यह भी कहा कि असेसिंग ऑफिसर को एक महीने के अंदर DRP के निर्देशों के अनुरूप एक आदेश पारित करना चाहिए। करदाता DRP के आदेश के खिलाफ इनकम टैक्स ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर सकता है।
अगर कंपनी असेसिंग ऑफिसर को विरोध दर्ज कराती है तो...
अगर कंपनी असेसिंग ऑफिसर के साथ विवाद लड़ने का विकल्प चुनती है, तो मामले को सुलझाने में अधिक वक्त लग सकता है। असेसिंग ऑफिसर ऑर्डर को अंतिम रूप देगा और तब इसे कमिश्नर (अपील) के समक्ष और फिर ट्रिब्यूनल में ले जाया जा सकता है। उसके बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकेगी। यह रास्ता चुनना मारुति सुजुकी के लिए भी महंगा साबित हो सकता है, क्योंकि अधिकारी कंपनी से विवादित राशि का कुछ प्रतिशत जमा करने के लिए कह सकते हैं।
वेद जैन एंड एसोसिएट्स के पार्टनर अंकित जैन का कहना है कि कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स के समक्ष अपील दायर करने के विकल्प के साथ आगे बढ़ने के लिए मारुति सुजुकी को कर अधिकारियों को कुल टैक्स डिमांड का 20 प्रतिशत जमा करना पड़ सकता है। आगे कहा कि इस तरह के सिनेरियो में कई जटिल कानूनी मतभेद शामिल रहते हैं। ऐसे में अपील को ज्यूडिशिएरी सिस्टम के कई स्तरों से गुजरना पड़ सकता है। मामला पूरी तरह से सुलझने से पहले लगभग 10 से 15 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।