शार्क या डाल्फिन? Shark Tank India के जजों पर भड़के अश्नीर ग्रोवर, सुझाया समाधान भी
बिजनेस रियल्टी टीवी शो शार्क टैंक इंडिया (Shark Tank India) के पूर्व जज अश्नीर ग्रोवर (Ashneer Grover) शो के दूसरे सीजन के दौरान हुई डील के पूरा होने में देरी पर भड़क गए। अश्नीर के मुताबिक शार्क इसलिए शार्क हैं क्योंकि वे फटाफट फैसला लेते हैं और तुरंत फैसला लेते हैं ताकि मछलियां यानी पिचर को प्रतिक्रिया करने के लिए समय न मिल सके
फाउंडर्स डील को लेकर शार्कों पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें पैसे नहीं मिल रहे, शर्तें बदली जा रही, वैल्यूएशन फिर से तय किया जा रहा। इन आरोपों को लेकर अनुपम मित्तल का कहना है कि फाउंडर्स को डील को लेकर शो एयर होने के बाद थोड़ा इंतजार करना चाहिए ताकि वे देख सकें कि क्या वे बाजार से और बेहतर ऑफर हासिल कर सकते है?
बिजनेस रियल्टी टीवी शो शार्क टैंक इंडिया (Shark Tank India) के पूर्व जज अश्नीर ग्रोवर (Ashneer Grover) शो के दूसरे सीजन के दौरान हुई डील के पूरा होने में देरी पर भड़क गए। अश्नीर के मुताबिक शार्क इसलिए शार्क हैं क्योंकि वे फटाफट फैसला लेते हैं और तुरंत फैसला लेते हैं ताकि मछलियां यानी पिचर को प्रतिक्रिया करने के लिए समय न मिल सके। वहीं अश्नीर के मुताबिक अगर वे कहते हैं कि इसमें समय लगेगा तो उन्हें शार्क नहीं बल्कि डॉल्फिन कहा जाना चाहिए। अश्नीर ने यह टिप्पणी इस शो के जजों यानी शार्कों और इसमें शामिल होने वाले फाउंडर्स के बीच डील होने में देरी, टर्म्स में बदलाव और वैल्यूएशन को लेकर फिर मोलभाव के चलते की है।
क्या है मामला
शार्क टैंक के दूसरे सीजन के एक कंटेस्टेंट यानी फाउंडर ने शो के एक जज यानी शार्क और शादीडॉटकॉम के फाउंडर अनुपम मित्तल से एक डील हासिल किया। शार्क को अगर कोई आइडिया जम जाता है तो वे इस पर निवेश करते हैं। अब यहां ये हुआ कि फाउंडर ने डील हासिल कर ली लेकिन 10 महीने के बाद पहले तय फंडामेंटल्स को लेकर मतभेद हो गए और उनके कारोबार को कमजोर बता दिया गया।
ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ एक फाउंडर के साथ हुआ है बल्कि कई फाउंडर्स ने इसकी शिकायत की है कि शार्क उस एपिसोड जिसमें इसका प्रसारण हुआ था, उसके ऑनलाइन ट्रैफिक, ऑडिएंस रिस्पांस इत्यादि के आधार पर डील को फिर से एसेस करते थे। कई बार तो ऐसा होता है कि फाउंडर्स और शार्क के बीच डील आगे नहीं बढ़ती है और कुछ कंटेस्टेंट की यह शिकायत है कि उनका कारोबार बंद होने की कगार पर पहुंच गया है।
शार्क टैंक इंडिया कितना प्रभावशाली है, इसके लिए अनुपम शार्क टैंक यूएस का उदाहरण देते हैं जहां शो के दौरान हुए डील का महज 60 फीसदी पूरा हो पाया जबकि यहां के पहले सीजन में करीब 70 फीसदी डील पूरे हुए। दूसरे सीजन को लेकर क्या आंकड़ा है, इस पर अनुपम का कहना है कि अधिकतर डील अभी प्रोसेस में है और 12 फाउंडर्स ने मनीकंट्रोल को बताया है कि उनमें से किसी को फंड नहीं मिला है। मित्तल का कहना है कि दूसरे सीजन का सही आंकड़ा पाने के लिए सीजन खत्म होने के छह महीने यानी अगस्त 2023 तक का इंतजार करना चाहिए।
अनुपम का कहना है कि शो के दौरान की डील के पूरा होने पर आमतौर पर एक साल लग जाते हैं। इसी बात को लेकर अश्नीर भड़क उठे और उनका कहना है कि किसी भी फाउंडर या बिजनेस के लिए एक साल का टाइमलाइन यथार्थवादी नहीं है। अश्नीर के मुताबिक फाउंडर ही नहीं, शार्क भी किसी सौदे के लिए एक साल का इंतजार नहीं कर सकते हैं। यह कारोबार के लिए अनुचित है। इसे ही लेकर अश्नीर ने शार्क या डॉल्फिन का उदाहरण दिया कि जल्द फैसले लेने वाले शार्क हैं और ऐसा नहीं होता है तो वे डॉल्फिन हैं।
अश्नीर ग्रोवर के मुताबिक शो का एक घंटा काफी है और वास्तव में जो पैसा फाउंडर को देने की डील है, वह उस फाउंडर का एपिसोड प्रसारित होने से पहले उसे मिल जाना चाहिए। इससे वे शो प्रसारित होने के बाद जो मांग बढ़ेगी, उसका फायदा उठा सकेंगे। ग्रोवर ने अपना उदाहरण दिया कि शार्क टैंक के पहले सीजन में उन्होंने जितने डील किए थे, उसमें से 55-60 फीसदी पूरे किए। अश्नीर का मानना है कि शो का अगला सीजन शुरू होने से पहले पूर्व सीजन के डील्स पूरे हो जाने चाहिए। बता दें कि शार्क टैंक के तीसरे सीजन की सुगबुगाबट शुरू हो चुकी हैं।
अश्नीर के मुताबिक शार्कों से कहा जाना चाहिए कि वे जो पैसा निवेश करने की योजना बना रहे हैं उसे एस्क्रो खाते में डाल दें। इस तरह जवाबदेही तय होगी और एक बजट भी तय हो जाएगा यानी कि फिर कोई बढ़ा-चढ़ाकर कमिटमेंट नहीं करेगा और बाद में रद्द नहीं करेगा। एस्क्रो खाता ऐसा खाता है जिसमें पैसे रखे जाते हैं और कुछ शर्तों को पूरा करने पर उसे जारी किया जाता है।
एक फाउंडर के मुताबिक डील की शर्तों में डेट फंडिंग भी थी। उन्हें इससे दिक्कत नहीं थी लेकिन बताया गया कि उनके पास डेट जारी करने के लिए वैध लाइसेंस नहीं है। इस पर ग्रोवर ने समाधान सुझाया कि कंपनी का शेयरहोल्डर लोन दे सकता है और अगर शार्क फंड देना ही चाहते हैं तो वे कंपनी का सिर्फ एक शेयर खरीद लें और लोन दे दें। अश्नीर के मुताबिक अगर इरादा है तो इस प्रकार के इश्यू आसानी से सुलझा सकते हैं।
फाउंडर्स डील को लेकर शार्कों पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें पैसे नहीं मिल रहे, शर्तें बदली जा रही, वैल्यूएशन फिर से तय किया जा रहा। इन आरोपों को लेकर अनुपम मित्तल का कहना है कि फाउंडर्स को डील को लेकर शो एयर होने के बाद थोड़ा इंतजार करना चाहिए ताकि वे देख सकते हैं कि क्या वे बाजार से और बेहतर ऑफर हासिल कर सकते है? अनुपम के मुताबिक सीजन पूरा होने तक शार्कों की दिनचर्या बहुत व्यस्त रहती है कि परिवार के लिए भी वक्त बहुत कम रहता है। शार्कों को शो की शूटिंग और प्रमोशन के लिए समय देना पड़ता है और अपनी कंपनी के लिए भी।
इसके अलावा मित्तल का कहना है कि नए फाउंडर्स को कभी-कभी फंडिंग राउंड के प्रोसेस की भी जानकारी नहीं होती है। कुछ ने प्रोप्रॉयटरशिप्स या पार्टनरशिप्स शुरू की है और अब उन्होंने कंपनी रजिस्टर कराने की प्रक्रिया शुरू की है जिसमें महीनों लग जाते हैं। कुछ ने कभी शेयरहोल्डर्स एग्रीमेंट पहले कभी देखा नहीं है और न ही वे कभी डीडी (ड्यू डिलीजेंस) प्रोसेस से गुजरे हैं।
अनुपम के मुताबिक इन सभी बेसिक कामों में उनकी टीम मदद करती है, अकाउंटेंट हायर करने में मदद की जाती है और बेसिक गवर्नेंस फ्रेमवर्क तैयार करने में भी। अनुपम के मुताबिक इन सबमें वक्त लगता है। हालांकि कभी-कभी डील नहीं हो पाती है क्योंकि कंपनी लीगल, फाइनेशियल और/या टैक्स डिलीजेंस को लेकर फेल हो जाती है या फाउंडर्स भी डील हासिल करने के लिए जरूर शर्तों को पूरा करने की शर्तों को पूरा नहीं करते हैं।