पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के निधन की खबर ने हर उस व्यक्ति को मायूस कर दिया जिसने 1990 के दशक के भारत को देखा है। बतौर वित्तमंत्री सिंह ने भारत की इकोनॉमी को जंजीरों से बाहर निकाला था। आज जो भारत हम देख रहे हैं, उसमें मनमोहन सिंह का बड़ा योगदान है। उन्होंने न सिर्फ भारत की अर्थव्यवस्था के लिए तेज ग्रोथ का रास्ता तैयार किया बल्कि आम आदमी की जिंदगी को आसान बनाने की कोशिश की। इस फर्क को वही समझ सकता है, जिसने लाइसेंस राज वाले भारत को देखा है।
बुनियादी चीजों के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ता था
दशकों तक इकोनॉमी के जंजीरों में बंधे रहने से बुनियादी चीजों के लिए भी देशवासियों को संघर्ष करना पड़ता था। चीनी, सीमेंट, केरोसीन जैसी बुनियादी जरूरत की चीजों के लिए परमिट बनवाना पड़ता था। सरकार राशन की दुकानों के जरिए आम लोगों तक ये चीजें पहुंचाती थी। स्कूटर-मोटरसाइकिल हो या कारें, लोगों के पास विकल्प का अभाव था। आज स्कूटर-मोटरसाइकिल की एक दर्जन से ज्यादा देशी और विदेशी कंपनियां देशवासियों को अपने प्रोडक्ट्स बेच रही हैं। कार खरीदने वाले को कई दिन सिर्फ यह तय करने में लग जाते हैं कि मॉडल की भरमार में से कौन सा मॉडल उसके लिए सही है। इसका श्रेय मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) को जाता है।
कई सेक्टर के दरवाजे प्राइवेट कंपनियों के लिए खोले
लाइफ इंश्योरेंस में LIC और जनरल इंश्योरेंस की चार सरकारी कंपनियों के अलावा लोगों के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं था। इन कंपनियों ने अपने एकाधिकार का खूब फायदा उठाया। एलआईसी के एजेंट्स लोगों को जीवन बीमा के नाम पर सेविंग्स कम इंश्योरेंस प्लान बेचते थे। जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के घिसेपिटे प्रोडक्ट्स से लोगों को संतोष करना पड़ता था। प्राइवेट इंश्योरेंस कंपनियों के लिए बाजार खुलते ही लोगों को अपनी जरूरत के हिसाब से इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स चुनने की आजादी मिल गई। इसका श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है।
कई समस्याओं में घिरी इकोनॉमी को बाहर निकाला
आम आदमी की जिंदगी को इस तरह आसान बनाने के अलावा मनमोहन सिंह ने तेज आर्थिक ग्रोथ के लिए रास्ता भी तैयार किया। देश का विदेशी मुद्रा भंडार कुछ ही हफ्तों के आयात के लिए पर्याप्त रह गया था। महंगाई बेकाबू हो चुकी थीं। डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू तेजी से गिर गई थी। गल्फ वॉर के चलते पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान में पहुंच गई थी। राजकोषीय घाटा 8 फीसदी से ज्यादा हो चुका था। एक साथ इतनी समस्याओं से घिरी इकोनॉमी को मनमोहन सिंह के अलावा दूसरा कोई सहारा नहीं दे सकता था।
इकोनॉमी की तेज ग्रोथ का रास्ता बनाया
1991 के लोकसभा चुनावों के बाद प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। 24 जुलाई को वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने नई सरकार का पहला पूर्ण बजट पेश किया। इसमें उन्होंने इकोनॉमी के रास्ते के कांटों को चुनचुन कर हटाने का एलान किया। सरकारी की इनकम बढ़ाने के लिए कॉर्पोरेट टैक्स में इजाफा किया। आयात शुल्क में बड़ी कमी की। उदारीकरण, प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन को ध्यान में रख इकोनॉमी की दिशा बदल दी। विदेशी निवेश अट्रैक्ट करने के लिए अनुकूल पॉलिसी तैयार करने पर फोकस बढ़ाया।
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डॉ मनमोहन सिंह के विजन ने इंडियन इकोनॉमी की तस्वीर बदल दी। कई सेक्टर के दरवाजे प्राइवेट कंपनियों के लिए खोल देने से नौकरियों के नए मौके बने। देश में कई छोटी-बड़ी चीजों का उत्पादन व्यापक पैमाने पर शुरू हो गया। लोगों की आमदनी बढ़ने से कंजम्पशन बढ़ने लगा। विदेशी और देशी कंपनियों के निवेश से नए प्रोडक्ट्स बाजार में दिखने लगे। भारतीय बाजार की शोभा ऐसे प्रोडक्ट्स बढ़ाने लगे, जो पहले यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देशों के बाजारों में नजर आते थे। कुल मिलाकर डॉ मनमोहन सिंह ने बीमार इंडिया इकोनॉमी का ऐसा इलाज किया कि आज भी यह इकोनॉमी अपने यौवन काल में है।