बुल्स के लिहाज से देखा जाए तो नतीजों का सीजन अच्छा रहा है। कोई चौंकाने वाली बात नहीं दिखी है। लगातार मार्केट में आ रहे निवेश को देखते हुए वैल्यूएशन के बारे में सवाल करने का कोई मतलब नहीं रह गया है। पिछले महीने तक म्यूचुअल फंड्स जमकर खरीदारी कर रहे थे। इस महीने उन्होंने अपनी खरीदारी घटाई है। लेकिन, इस गैप को विदेशी फंडों ने भरा है। जून में करीब 26,000 करोड़ रुपये की खरीदारी के बाद उन्होंने अतिरिक्त 15,000 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर खरीदे हैं। इसके उलट में घरेलू फंडों ने जुलाई में 8,900 करोड़ रुपये से कम की खरीदारी की है। यह स्मार्ट स्ट्रेटेजी है। लोकल फंड्स इस मौके का फायदा उठा रहे हैं। वे विदेशी फंडों की खरादीरी के बीच मुनाफावसूली कर रहे हैं। बाद में वे कम कीमतों पर कैश का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, इससे सही वैल्यूएशन वाले स्टॉक्स तलाशने की उनकी प्रॉब्लम का समाधान होता नहीं दिख रहा।
