FIFA World Cup 2022: कतर में फुटबॉल का विश्व कप हो रहा है। हालांकि दुनिया में फुटबॉल के सबसे बड़े प्रतियोगिता के आयोजक कतर में सब कुछ सही नहीं है। मानवाधिकार संगठन कतर में होमोसेक्सुअल लोगों (LGBTQ ) के साथ बर्ताव को लेकर कतर पर निशाना साधे हुए हैं। यहां स्टेडियम बनाने वाले कुछ कामगारों को होमोसेक्सुअलिटी के कारण मौत दे दी गई। विश्व कप कराने वाली संगठन फीफा (FIFA) के प्रमुख सेप ब्लैटर कतर को मेजबान चुने जाने पर पहले ही अफसोस जाहिर कर चुके हैं। हालांकि इसके बावजूद बायकॉट की कहीं आहट भी नहीं सुनाई पड़ रही है। जो कंपनियां नैतिकता की पैरोकार बनती हैं, वे भी इसे लेकर चुप्पी साधे हुई हैं।
क्यों कंपनियों ने साधी है चुप्पी
फुटबॉल विश्व कप को करीब 500 करोड़ लोग देखेंगे जो दुनिया की जनसंख्या का करीब दो-तिहाई हिस्सा है। अब इतने लोग देखेंगे को दिग्गज कंपनियां अपने प्रोडक्ट को उन तक पहुंचाने के लिए पैसे खर्च करने के लिए भी तैयार हैं। ब्लूमबर्ग न्यूज ने इसे लेकर टूर्नामेंट या इसमें हिस्सा लेने वाली टीमों की एडिडास एजी (Adidas AG) और कोका कोला (Coca Cola) से लेकर Volkswagen AG और Microsoft Inc की XBox जैसी 76 स्पांसर कंपनियों से संपर्क किया। ये कंपनियां ऐसी जगहों से हैं, जहां कतर के खिलाफ मानवाधिकारों को लेकर सबसे अधिक आलोचना हो रही है।
फीफा की सातों स्पांसर में किसी ने भी यह नहीं कहा कि मानवाधिकारों से जुड़ मसले के चलते वे विज्ञापनों की योजना में कोई बदलाव करेंगी। विश्व कप में हिस्सा ले रही राष्ट्रीय टीमों की 69 स्पांसर में 20 ने मानवाधिकारों को लेकर अपनी प्रतिबद्धता तो जताई लेकिन इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है कि वे अपनी मार्केटिंग में किस तरह का बदलाव करेंगी। तेरह कंपनियों ने कहा कि वे एडजस्टमेंट करेंगी लेकिन उममें से कुछ के कतर से मजबूत कारोबारी संबंध हैं।
कतर की मेजबानी पर सवाल लेकिन वित्तीय तौर पर चुप्पी
फुटबॉल का विश्व कप कतर में कराए जाने को लेकर फीफा के प्रमुख से लेकर मानवाधिकार कार्यकर्ता तक विरोध में हैं। हालांकि वित्तीय नजरिए से चुप्पी बनी हुई है। फुटबॉल के दुनिया भर में अरबों प्रशंसक हैं तो ऐसे समय में जब दुनिया भर की अर्थव्यवस्था नाजुक दौर से गुजर रही है, एक लोगो या मार्केटिंग स्लोगन के जरिए कंपनियां अधिक से अधिक लोगों की नजरों में आने की कोशिश कर रही है। एक अनुमान के मुताबिक फीफा को इस विश्व कप से रिकॉर्ड मुनाफा होगा और रूस में चार साल पहले हुए 540 करोड़ डॉलर का लेवल पार हो सकता है।
मानवाधिकारों को लेकर चिंता जरूर जताई जा रही है लेकिन लंदन के बेरेनबर्ग बैंक की एक यूरोपियन मीडिया एनालिस्ट साराह सिमन के मुताबिक यह चार साल में एक बार होने वाला टूर्नामेंट है तो कंपनियां इस मौके का फायदा उठाने से नहीं चूकेंगी। कंपनियां ओलंपिक, सुपर बाउल और वर्ल्ड कप जैसे अहम मौकों पर विज्ञापनों के लिए अधिक से अधिक पैसे चुकाने के लिए तैयार रहती हैं।