पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: प्रेसिडेंसी डिविजन की 111 सीटें ही तय कर देंगी जीत-हार
West Bengal Chunav 2026: यह डिवीजन बंगाल की पूरी ताकत, आबादी, अर्थव्यवस्था और राजनीति का केंद्र है। यहां बंगाल की जनसांख्यिकीय भारी भरकम आबादी, आर्थिक मजबूती और राजनीतिक गतिविधियां इतनी तीव्रता से केंद्रित हैं कि बाकी चार डिवीजनों में इतनी शक्ति और प्रभाव नहीं है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: प्रेसिडेंसी डिविजन की 111 सीटें ही तय कर देंगी जीत-हार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक पुरानी कहावत रही है- जो कोलकाता और उसके आसपास के इलाकों को जीतता है, वही बंगाल पर राज करता है। 2026 के विधानसभा चुनावों में भी सभी निगाहें एक बार फिर इन इलाकों पर टिकी हैं। राज्य की कुल 294 सीटों में से करीब एक-तिहाई यानी 111 सीटें अकेले प्रेसिडेंसी डिविजन से आती हैं। पश्चिम बंगाल को पांच प्रशासनिक डिवीजनों में बांटा गया है– प्रेसिडेंसी, बर्धमान, मेदिनीपुर, मालदा और जलपाईगुड़ी।
इनमें से प्रेसिडेंसी डिवीजन सबसे खास और महत्वपूर्ण माना जाता है। इसमें कोलकाता, हावड़ा, नदिया, उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना शामिल हैं।
यह डिवीजन बंगाल की पूरी ताकत, आबादी, अर्थव्यवस्था और राजनीति का केंद्र है। यहां बंगाल की जनसांख्यिकीय भारी भरकम आबादी, आर्थिक मजबूती और राजनीतिक गतिविधियां इतनी तीव्रता से केंद्रित हैं कि बाकी चार डिवीजनों में इतनी शक्ति और प्रभाव नहीं है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह इलाका सिर्फ एक क्षेत्र नहीं, बल्कि वो 'पावर सेंटर' है, जो तय करेगा कि राज्य की सत्ता की चाबी ममता बनर्जी के पास रहेगी या BJP पहली बार कोलकाता के 'लाल बाजार' तक पहुंचेगी।
क्या है प्रेसिडेंसी डिविजन का गणित?
प्रेसिडेंसी डिविजन में राज्य के पांच महत्वपूर्ण जिले शामिल हैं:
कोलकाता (उत्तर और दक्षिण)
हावड़ा
नदिया
उत्तर 24 परगना
दक्षिण 24 परगना
इन पांच जिलों में फैली 111 सीटें (कुछ आंकड़ों के अनुसार 108-111) बंगाल की जीत का मुख्य द्वार हैं। उत्तर और दक्षिण 24 परगना अकेले ही 64 सीटों का योगदान देते हैं।
TMC का अभेद्य किला
2011 में जब ममता बनर्जी ने वामपंथियों के 34 साल के शासन को उखाड़ फेंका था, तब इसी प्रेसिडेंसी डिविजन ने उन्हें सबसे बड़ा समर्थन दिया था।
2011: TMC और कांग्रेस गठबंधन ने यहां की 89 सीटों पर कब्जा जमाया।
2016: TMC ने अकेले दम पर 91 सीटें जीतीं।
2021: BJP की लहर के बावजूद, तृणमूल कांग्रेस ने यहां अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 96 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि भाजपा को महज 14 सीटें मिलीं।
यही कारण है कि इसे ममता बनर्जी का 'दक्षिणी किला' कहा जाता है। यहां अल्पसंख्यकों की अच्छी-खासी आबादी और शहरी मतदाताओं का झुकाव अब तक TMC के पक्ष में रहा है।
प्रेसिडेंसी के दम पर ही जीतते रहे वामपंथी
सिर्फ TMC ही नहीं इससे पहले वापपंथी सरकार भी इन सीटों के दम पर ही राज्य की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए बैठी थी। इन 111 सीटों पर बदलाव इतना गहरा और साफ है कि आंखें बंद करके भी अनदेखा नहीं किया जा सकता।
साल 2006 में CPI(M) की अगुवाई वाला वाम मोर्चा (लेफ्ट फ्रंट) इन 108 सीटों में से 72 सीटें जीतकर कब्जा जमाए हुए था। तीन दशकों की मेहनत से उन्होंने हर गली, हर मोहल्ले की कमेटी, हर ट्रेड यूनियन और शहरी-उपशहरी इलाकों में अपनी पकड़ इतनी मजबूत बना ली थी कि लगता था कोई उन्हें हिला भी नहीं सकता। हालांकि, TMC ने इस किले को 2011 में ढहा दिया।
भाजपा के लिए सत्ता का रास्ता
बीजेपी के लिए समीकरण बिल्कुल साफ है- अगर उसे बंगाल जीतना है, तो उसे प्रेसिडेंसी डिविजन में सेंध लगानी ही होगी। 2021 में भाजपा ने उत्तर बंगाल और जंगलमहल में तो अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन प्रेसिडेंसी डिविजन में वह पिछड़ गई।
हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों ने भाजपा को नई उम्मीद दी है। 2024 के रुझानों के मुताबिक, BJP ने इस क्षेत्र के 21 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई थी। नदिया और उत्तर 24 परगना के मतुआ समुदाय वाले इलाकों में BJP की पकड़ मजबूत हुई है। BJP नेताओं का मानना है कि अगर वे इस बार यहां की 50% सीटें भी जीत लेते हैं, तो बंगाल में सरकार बनाना उनके लिए आसान हो जाएगा।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, प्रेसिडेंसी डिवीजन में BJP की मुश्किलों को लेकर एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, “प्रेसिडेंसी डिवीजन में हम संगठन के लिहाज से तृणमूल कांग्रेस (TMC) के मुकाबले बहुत कमजोर हैं। TMC ने इन इलाकों में अपनी पूरी मशीनरी लगा दी और खुलेआम धांधली और फर्जी वोटिंग की। लेकिन इस बार वे ऐसा नहीं कर पाएंगे।"
वह आगे कहते हैं, "अगर चुनाव आयोग अपना काम ठीक से करता है, तो इस डिवीजन में जनता एक चौंकाने वाला नतीजा देगी। हम सिर्फ दक्षिण 24 परगना और हावड़ा में ही अपना खाता नहीं खोलेंगे, बल्कि इन 111 सीटों में से लगभग आधी सीटें जीत लेंगे।”
भाजपा के राज्यसभा सांसद राहुल सिन्हा ने कहा, “इस बार का चुनाव पूरी तरह अलग है। नतीजे देखकर आप हैरान रह जाएंगे। जो इलाके अभी आपको तृणमूल कांग्रेस का गढ़ लग रहे हैं, चुनाव के बाद आप देखेंगे कि वे कैसे टूटकर गिर रहे हैं। लोग बदलाव के लिए वोट करेंगे। नतीजे सारे गणित और अनुमानों को गलत साबित कर देंगे।”
यह इलाका इतना खास क्यों है?
डेमोग्राफिक वेट: राज्य की 36% से ज्यादा जनसंख्या इसी क्षेत्र में रहती है।
आर्थिक ताकत: बंगाल की GDP का लगभग 45-50% हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। कोलकाता का वित्तीय ढांचा और औद्योगिक बेल्ट यहीं है।
नेताओं की पसंद: पश्चिम बंगाल के ज्यादातर मुख्यमंत्री- ज्योति बसु, बुद्धदेव भट्टाचार्य और ममता बनर्जी- इसी क्षेत्र से चुनाव लड़ते और जीतते आए हैं।
मुख्य चुनौतियां और मुद्दे
TMC के लिए चुनौती: भ्रष्टाचार के आरोप, संदेशखाली जैसी घटनाएं और स्थानीय स्तर पर सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) इस किले में दरार डाल सकती हैं।
BJP के लिए चुनौती: संगठनात्मक कमजोरी। कोलकाता और दक्षिण 24 परगना जैसे जिलों में भाजपा के पास अभी भी TMC जैसा मजबूत जमीनी ढांचा नहीं है। साथ ही, मतुआ वोट बैंक को लेकर CAA और SIR (Special Intensive Revision) जैसे मुद्दे भी पेचीदा बने हुए हैं।
प्रेसिडेंसी डिविजन केवल सीटों का समूह नहीं है, बल्कि यह बंगाल की 'नब्ज' है। यहां की 111 सीटें ही तय करेंगी कि दीदी की 'हैट्रिक' के बाद चौथी पारी शुरू होगी या भाजपा का 'सोनार बांग्ला' का सपना हकीकत बनेगा। अगर भाजपा इस किले को तोड़ने में सफल रही, तो बंगाल का इतिहास बदल जाएगा, वरना ममता बनर्जी का दक्षिण बंगाल पर वर्चस्व अटूट बना रहेगा।