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UGC New Guidelines Row: अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा यूजीसी विवाद, नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को चुनौती

UGC New Guidelines 2026 Row: यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जाति के आधार पर भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम बनाने के फैसले से पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। कई वर्गों ने नए नियमों के गलत इस्तेमाल की आशंका और झूठी शिकायतों पर सज़ा देने का कोई नियम न होने पर चिंता जताई है

Akhilesh Nath Tripathiअपडेटेड Jan 27, 2026 पर 3:07 PM
UGC New Guidelines Row: अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा यूजीसी विवाद, नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को चुनौती
UGC New Guidelines 2026 Row: जनरल कैटेगरी के छात्रों ने नए नियमों के खिलाफ दिल्ली में यूजीसी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन का ऐलान किया है

UGC New Guidelines 2026 Row: सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के हाल ही में जारी किए गए नियमों को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये नियम जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाते हैं। साथ ही कुछ खास कैटेगरी को संस्थागत सुरक्षा से बाहर कर दिया गया है। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जाति के आधार पर भेदभाव को रोकने के लिए नए नियम बनाने के फैसले से सरकार के खिलाफ पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए हैं।

याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के हाल में अधिसूचित 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी नियम 3 (c)' गैर-समावेशी है। इसमें जो छात्र एवं शिक्षक आरक्षित कैटेगरी के नहीं हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। विनीत जिंदल की तरफ से दाखिल याचिका में नए नियमों की आलोचना की गई है। इसमें कहा गया है कि जाति आधारित भेदभाव को सख्ती से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है।

इसमें आगे कहा गया कि 'जाति-आधारित भेदभाव' का दायरा सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी कैटेगरी तक सीमित कर दिया गया है। यूजीसी ने 'सामान्य' या गैर-आरक्षित कैटेगरी के लोगों को संस्थागत सुरक्षा देने से असल में इनकार किया है। उन्हें अपनी जाति की पहचान के आधार पर उत्पीड़न या भेदभाव का भी सामना करना पड़ सकता है।

इसमें कहा गया है कि यह नियम आर्टिकल 14 (बराबरी का अधिकार) और 15(1) (धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर राज्य द्वारा भेदभाव पर रोक) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि यह नियम संविधान के आर्टिकल 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है) का उल्लंघन करता है।

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