अमिताभ तिवारी

अमिताभ तिवारी
'काम किया दिल से, कांग्रेस फिर से' यह कांग्रेस (Congress) का चुनावी नारा है। भाजपा (BJP) ने नारा दिया है-'नहीं सहेगा राजस्थान'। किस नारे पर जनता को भरोसा है इसका पता 3 दिसंबर को चलेगा। तब तक आपको दोनों दलों के दावों को ध्यान से सुनना होगा। इससे हो सकता है कि 3 दिसंबर से पहले ही आपको पता चल जाए कि जनता को कौन सा नारा पसंद आ रहा है।
क्या 1993 से चली आ रही परंपरा टूटेगी?
अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) क्या इस बार सत्ता में लौटने में सफल होंगे ? 1993 से अब तक राजस्थान में किसी मुख्यमंत्री के लगातार दो बार सरकार चलाने का रिकॉर्ड नहीं है। 1993 में BJP सिर्फ 95 सीटे जीत पाई थी। 2003 में उसने 120 सीटों पर जीत हासिल की थी। 2013 में इसने 163 सीटे जीती थी। 1998 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 153 सीटों पर जीत हासिल की थी। तब पहली बार गहलोत राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। 2008 और 2018 में कांग्रेस ने इंडिपेंडेंट और BSP के समर्थन से सरकार बनाई थी। अगर अब तक देखे गए ट्रेंड की बात करें तो इस बार भाजपा को राजस्थान में सरकार बनानी चाहिए। अगर वोट शेयर की बात करें तो BJP और Congress का करीब एक तरह का सपोर्ट लेवल है। यही वजह है कि पिछले कई सालों में दोनों दलों में कांटे का मुकाबले दिखता रहा है। RLP, NPP, BTP जैसी छोटी पार्टियां और स्वतंत्र विधायक राजस्थान की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। इनका वोट शेयर 17 से 23 फीसदी के बीच रहा है।
जाति के नाम पर पार्टियां लड़ती रही हैं चुनाव
हिंदी भाषी दूसरे राज्यों की तरह राजस्थान के चुनावों में भी जाति का एक बड़ा फैक्टर रहा है। मतदाताओं में ऊपरी जाति/जनरल कैटेगरी 19 फीसदी, हिंदू ओबीसी 39 फीसदी, एसटी 13 फीसदी, मुस्लिम 9 फीसदी और अन्य 2 फीसदी रही है। अगर मुस्लिम और ओबीसी को मिला दिया जाए तो कुल मतदाताओं में दोनों की हिस्सेदारी 45-48 फीसदी तक पहुंच जाती है। वसुंधरा राजे ने हमेशा जाति का कार्ड चुनावों में खेला है। वह खुद को राज्य की जाट बहू, राजपूत की बेटी और गुज्जर की समधन बताती रही हैं। लेकिन, 2018 में इसका कोई फायदा उन्हें नहीं मिला।
जयपुर का रास्ता मारवाड़ से निकलता है
राजस्थान के 200 विधायकों में ब्राह्मण, राजपूत, जाट, गुज्जर और मीणा जाति के 94 विधायक हैं। यह करीब 47 फीसदी बैठता है। चुनावी संरचना के लिहाज से राजस्थान को पांच इलाकों में बांटा जा सकता है। इनमें मारवाड़ (61), धुंधार (58), मेवाड़ (43), शेखावाटी (21) और हड़ौती (17) शामिल हैं। मेवाड़ और हड़ौती बीजेपी के गढ़ रहे हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जयपुर का रास्ता माड़वाड़ से होकर निकलता है। राजस्थान में 51 ऐसा सीटे हैं, जिन पर कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा का कब्जा रहता है। अभी इनमें से 47 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। 2018 के विधानसभा चुनावों में एसी 18 सीटे थीं, जहां कांटे का मुकाबला देखने को मिला था। इन सीटों पर जीत और हार के बीच का अंतर 5,000 वोटों से कम था।
आपसी कलह से दोनों पार्टियां परेशान
कांग्रेस और भाजपा दोनों को पार्टी की आंतरिक लड़ाइयों का सामना करना पड़ा है। अशोक गहलतो और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की लड़ाई जगजाहिर है। हालांकि, पिछले कुछ समय से दोनों के बीच काफी हद तक सुलह दिख रही है। इसकी बड़ी वजह पायलट को केंद्रीय नेतृत्व से मिला यह आश्वासन है कि राज्य का मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इस बारे में फैसला चुनाव के बाद होगा। उधर, वसुंधरा राजे केंद्रीय नेतृत्व से नाखुश लग रही हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि BJP ने उन्हें राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं किया है। पार्टी इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना चाहती है।
भाजपा ने बदली है रणनीति
भाजपा 41 उम्मीदावरों ने नाम घोषित कर चुकी है। इनमें से सिर्फ 2 सीट पार्टी 2018 के चुनावों में जीत सकी थी। पार्टी ने इस बार 7 सासंदों को चुनावी समर में उतारा है। इससे पता चलता है कि पार्टी राजस्थान चुनावों को कितनी गंभीरता से ले रही है। वसुंधरा राजे के कई करीबी नेताओं का टिकट काट दिया गया है। इससे वसुंधरा खेमें में नाराजगी है। लेकिन, भाजपा ने राज्य में सत्ता गहलोत के हाथ से छीनने के लिए इस बार अलग तरह की रणनीति पर काम करती दिख रही है। हर सीट के उम्मीदवार का फैसला बहुत कैलकुलेशन के बाद हो रहा है। भाजपा का फोकस उन उम्मीदवारों को टिकट देने पर है, जो पार्टी की झोली में जीत डाल सकते हैं।
इस बार कोई एक बड़ा मुद्दा नहीं
इस बार चुनावों में कोई खास मुद्दा नहीं दिख रहा है। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे पारंपरिक मुद्दे इस चुनाव में भी दिख रहे हैं। हालांकि, भाजपा लगातार राज्य की विधि-व्यवस्था पर सवाल खड़े करती रही है। उसने गहलोत पर महिलाओं और लड़कियों को सुरक्षा देने में नाकाम रहने का भी आरोप लगाया है। इसके अलावा दोनों दलों ने कल्याणकारी योजनाओं की झड़ी लगा दी है। हालांकि, यह पता नहीं कि उन्हें लागू करने के लिए पैसे कहां से आएंगे।
(अमिताभ तिवारी पॉलिटिकल स्ट्रेटेजिस्ट और कमेंटेटर हैं। वह कॉर्पोरेट और इनवेस्टमेंट बैंकर रह चुके हैं। यहां व्यक्त विचार उनके अपने विचार है। इसका इस पब्लिकेशन से कोई संबंध नहीं है।)
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