Budget 2023: 2020 में भारत की जीवन प्रत्याशा 70 साल हो गई, जो 1970 में 48 साल के आसपास थी। स्पष्ट है कि दशकों से शानदार ग्रोथ के साथ भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी पॉजिटिव असर पड़ा है। इसी तरह मातृ और शिशु मृत्यु दर में भी सुधार देखने को मिला है। भारत में तीन स्तरीय पब्लिक हेल्थ सिस्टम (public health system) है। सरकार की हेल्थ सर्विसेज, इससे जुड़ी नीतिगत पहलों के लिए सराहना की जानी चाहिए। यह जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाएं देने में खासी मददगार रही हैं।
हेल्थकेयर डिलिवरी में डिजिटल प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता, Ayushman Bharat स्कीम का विस्तार ऐसी ही कुछ पहल हैं। इसके साथ ही निवारक स्वास्थ्य, टेस्टिंग और स्क्रीनिंग के इर्दगिर्द एक राष्ट्रीय एजेंडा तैयार करने की जरूरत है, क्योंकि भारत में बीमारियों के बोझ को कम करने के लिए ये अहम हैं।
सरकार ने वंचित और कमजोर परिवारों तक पहुंच प्रदान करने के लिए National Health Mission और Jan Aushadhi जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पूरे भारत में स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए कई उपाय किए हैं।
विश्वसनीय हेल्थकेयर इंफ्रा की जरूरत
भले ही उक्त पहल निश्चित रूप से सही दिशा में उठाए गए कदम हैं, लेकिन भारत को बजट में देश की 140 करोड़ आबादी को ध्यान में रखते हुए एक ज्यादा विश्वसनीय और प्रतिक्रियाशील हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाकर हेल्थकेयर की समान पहुंच सुनिश्चित करने की जरूरत है। मुख्य रूप से प्राइमरी और एडवांडस डायग्नोस्टिक्स की ज्यादा पहुंच पर जोर देने की जरूरत है।
इन बीमारियों पर हो खास जोर
भारत को HIV, Hepatitis और HPV जैसी संक्रामक बीमारियों के प्रबंधन के लिए Ayushman Bharat स्कीम के तहत स्क्रीनिंग प्रोग्राम पेश करने की जरूरत है। ऐसा सेंट्रलाइज और डिसेंट्रलाइज, अस्पताल-आधारित और मोबाइल साइट टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। इसमें रोगी परीक्षण, सेल्फ टेस्ट, सेंटर्स के जरिए अभियान और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से नमूना संग्रह शामिल हैं। भले ही पीएम 2025 तक टीबी के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध हैं, लेकिन टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाए जाने की जरूरत है। याद रखना चाहिए कि भारत 2020-21 के दौरान जब महामारी चरम पर थी, 1 लाख से ज्यादा नमूनों की टेस्टिंग कर रहा था।
पीपीपी प्रोजेक्ट की हो पहल
जनता को हेल्थकेयर सेवाएं देने के लिए पीपीपी के जरिये विशेषज्ञता और हाई क्वालिटी स्टैंडर्ड वाली प्राइवेट कंपनियों को जोड़ना उचित हो सकता है। वास्तव में, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि नीतिगत पहलों ने पीपीपी को सफल बनाया है। भारत ने महामारी से निपटने के लिए दुनिया के लिए एक मॉडल के रूप में काम किया है - चाहे वह महामारी का पता लगाना हो, ट्रैक करने और परीक्षण करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग हो।
हमें न केवल अन्य महामारी से भारत को भविष्य में सुरक्षित करने के लिए, बल्कि एक स्वस्थ और उत्पादक राष्ट्र की गारंटी के लिए उसी गति के साथ काम करना चाहिए। साथ ही एनसीडी और आईडी के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए आवश्यक तंत्र भी स्थापित करना चाहिए।
(लेखक नरेंद्र वरदे Roche Diagnostics India and Neighbouring Markets के एमडी हैं। ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं।)