आम परिवारों की तरह सरकार को भी अपने खर्च की प्राथमिकता तय करनी पड़ती है। हर साल सरकार अपने 12 महीने के खर्च का प्लान बनाती है। इसके लिए वह यूनियन बजट पेश करती है। मामला तब थोड़ा जटिल हो जाता है जब साल के खर्च को दो हिस्सों में बांटना पड़ता है। ऐसा हर पांच साल पर होता है, जब देश में लोकसभा चुनाव होता है। फिलहाल, फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं।
8 महीनों के लिए होगा Budget 2024
पहला, उनके पास देखने के लिए पिछला बजट (Budget) नहीं है, क्योंकि वह एक अंतरिम बजट (Interim Budget) था। तब सरकार ने पॉलिसी से जुड़ी कई चीजें लोकसभा चुनावों के बाद बनने वाली नई सरकार के लिए छोड़ दी थी। दूसरा, वह (सीतारमण) नई सरकार का पहला फुल बजट (Budget 2024) पेश करेंगी। यह बजट 8 महीनों के लिए होगा। फाइनेंस मिनिस्टर अगले साल 1 फरवरी को फुल बजट पेश करेंगी, जो फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए होगा।
सरकार के फिस्कल रोडमैप पर नजर
सवाल यह है कि सरकार का फिस्कल रोडमैप कैसा होगा, जब राजनीति के लिहाज से स्थितियां बदल गई हैं? क्या सरकार रिस्क लेगी और वित्तीय अनुशासन (Fiscal Discipline) की कीमत पर लोकलुभावन (Populist) पॉलिसी को प्राथमिकता देगी? या वह संतुलन के साथ अपने संसाधन को बचाते हुए अचानक वेल्फेयर स्कीम पर फोकस बढ़ाने की जगह इस दिशा में धीरे-धीरे कदम बढ़ाने की कोशिश करेगी? सरकार का अंतिम लक्ष्य अपनी वित्तीय सेहत को मजबूत बनाने हुए आने वाले सालों में इकोनॉमी की ग्रोथ को तेज बनाए रखना है।
इस साल 1 फरवरी को पेश अंतरिम बजट में फाइनेंस मिनिस्टर ने 2024-25 में फिस्कल डेफिसिट को जीडीपी के 5.1 फीसदी तक रखने का टारगेट रखा था। सरकार ने फाइनेंशियल ईयर 2025-26 तक फिस्कल डेफिसिट को जीडीपी के 4.5 फीसदी तक लाना चाहती है। यह 2024-25 के मुकाबले 70 बेसिस प्वाइंट्स कम है। 10.5 फीसदी के नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ को देखते हुए 2024-25 का 5.1 फीसदी टारगेट हासिल हो सकता है।
सरकार को कम कर्ज लेना होगा
फाइनेंशियल ईयर 2024-25 के फिस्कल डेफिसिट को देखते हुए बॉन्ड्स के जरिए सरकार को 11.75 लाख करोड़ रुपये का कर्ज लेना पड़ सकता है। बाकी पैसा स्मॉल सेविंग्स और दूसरे स्रोतों से आने की उम्मीद है। ग्रॉस मार्केट बॉरोइंग (कुल कर्ज) 14.13 लाख करोड़ रुपये रह सकता है, जबकि 2023-24 का संशोधित अनुमान 15.43 लाख करोड़ रुपये है। फाइनेंस मिनिस्टर को रेवेन्यू बेहतर रहने का भरोसा है, जिससे डेफिसिट नियंत्रण में रहेगा। 2024-25 में टैक्स से कुल 26.01 लाख करोड़ रुपये आने का अनुमान है। यह पिछले साल के 23.2 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से 11 फीसदी ज्यादा है।
लगातार तीन साल की अच्छी ग्रोथ के बाद सरकार का पूंजीगत खर्च घटा है। 2023-24 की 33 फीसदी ग्रोथ के मुकाबले 2024-25 की ग्रोथ 11 फीसदी पर आ गई है। इससे भी सरकार के पास अपने फिस्कल डेफिसिट को तय सीमा के अंदर बनाए रखने की गुंजाइश होगी।
क्या सरकार लोकलुभावन पॉलिसी अपनाएगी?
नजरें इस बात पर होंगी कि राजनीतिक परिदृश्य में आए बदलाव के बाद वेल्फेयर इकोनॉमिक्स को देखते हुए सरकार की फिस्कल पॉलिसी में बदलाव आता है या नहीं। अंतरिम बजट में फाइनेंस मिनिस्टर ने यह संकेत दिया था कि सरकार का फोकस रेवड़िया बांटने के बजाय लोगों को सक्षम बनाने पर होगा। सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा था, "गरीबी हटाने के पहले के तरीकों के सीमित फायदे रहे हैं।"
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सरकार की फिस्कल पॉलिसी से यह संकेत मिलेगा कि चुनावी नतीजों की वजह से सरकार के रोडमैप में बदलाव नहीं आएगा और सरकार के अनुमानित कर्ज में किसी तरह का संशोधन नहीं होगा। फिस्कल कंसॉलिडेशन को हमेशान एक प्रोसेस के रूप में देखना चाहिए न कि इसे चुनाव के नतीजों से जोड़ना चाहिए।