Interim Budget 2024: हर साल यूनियन बजट (Union Budget) से एक दिन पहले सरकार इकोनॉमिक सर्वे पेश करती है। इसमें इकोनॉमी की सेहत और संभावनाओं के बारे में जानकारी होती है। इसमें सरकार इकोनॉमी के रास्ते की चुनौतियों और उनके समाधान के बारे में भी बताती है। लेकिन, सरकार शायद ही कभी सिर्फ आर्थिक मसलों को ध्यान में रख कर बजट पेश करती है। यही वजह है कि अक्सर बजट में इकोनॉमिक सर्वे में बताई गई बातों को नजरअंदाज किया जाता है। इस साल सरकार अंतरिम बजट पेश करने जा रही है। इसलिए इस बार इकोनॉमिक सर्वे नहीं आएगा।
अंतरिम बजट 2024 से पहले वित्तमंत्रालय ने इकोनॉमिक रिव्यू पेश किया
अप्रैल-मई में लोकसभा चुनावों के बाद जो नई सरकार बनेगी वह पूर्ण बजट पेश करेगी। इसके पहले इकोनॉमिक सर्वे आएगा। हालांकि, वित्तमंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने बजट से पहले इकोनॉमी पर एक रिपोर्ट (इकोनॉमिक रिव्यू) पेश की है। इससे इकोनॉमी को लेकर वित्त मंत्रालय की सोच का पता चलता है।
अगले वित्त वर्ष में ग्रोथ रेट 7 फीसदी रहने का अनुमान
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले सालों में इंडिया की ग्रोथ तेज बनी रहेगी। यह भी कहा गया है कि पॉलिसी रिफॉर्म्स के उपायों की बदौलत इंडियन इकोनॉमी में भरोसा बढ़ा है। इंडिया ने पूरे भरोसे के साथ अमृतकाल के दौर में प्रवेश किया है। इसमें अगले वित्त वर्ष में जीडीपी की ग्रोथ रेट 7 फीसदी रहने की उम्मीद जताई गई है। इससे ऐसा लगता है कि ग्रोथ बढ़ाने के लिए विशेष उपाय करने की जरूरत नहीं है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि सरकार फिस्कल डेफिसिट को वित्त वर्ष 2025-26 तक घटाकर 4.5 फीसदी तक लाने के टारगेट को हासिल करने के रास्ते पर है।
इकोनॉमिक रिव्यू में अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर
लेकिन, कुछ इकोनॉमिस्ट्स और एनालिस्ट्स का मानना है कि प्राइवेट कंजम्प्शन की ग्रोथ अब भी कमजोर बनी हुई है। वित्त वर्ष 2023-24 में इसके साल दर साल आधार पर 4.4 फीसदी रहने का अनुमान है। अगर करोना की महामारी के दौर को छोड़ दिया जाए तो यह बीते कई सालों में सबसे कम है। लेकिन, लेकिन इकोनॉमिक रिव्यू में जो तस्वीर पेश की गई है, वह इससे काफी अलग है। इसमें बताया गया है कि कंजम्प्शन डिमांड में रिकवरी है। जीडीपी में प्राइवेट फाइनल कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर (PFCE) की हिस्सेदारी बढ़ी है। यह भी कहा गया है कि लॉकडाउन और बाद के सालों में स्टॉक मार्केट्स में रिटेल इनवेस्टर्स की हिस्सेदारी बढ़ने से मार्केट कैपिटलाइजेशन बढ़ा है। इसके चलते निवेशकों ने पैसे कमाए हैं, जिससे कंजम्प्शन को बढ़ावा मिला है।