ICICI Bank ने ऑस्ट्रेलिया की कोल माइन पर लगाया गलत दांव! संकट में फंस गए 7,000 करोड़ रुपये

ICICI Bank ने 2010 से कई किस्तों में लैंको ग्रुप को ऑस्ट्रेलिया में एक कोल माइन खरीदने के लिए 85 करोड़ डॉलर का लोन दिया था। हालांकि, 2017 में यह कर्ज बैड लोन में तब्दील हो गया। तब से लेंडर्स घाटे में चल रही इस मान की प्रभावी ओनरशिप को लेकर ही जूझ रहे हैं और कथित रूप से नियंत्रण को लेकर चुप हैं

अपडेटेड Jan 13, 2023 पर 4:00 PM
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वास्तव में ICICI Bank ऐसा अकेला बैंक नहीं है, जिसने 2010 के बाद ऐसे जोखिम भरे कॉर्पोरेट लोन दिए थे। उस समय ज्यादातर भारतीय बैंक ग्लोबल एनर्जी सेक्टर पर दांव लगाने को उत्साहित थे
     
     
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    ICICI Bank : भारत में अब बड़े कॉर्पोरेट लोन को बट्टे खातों में डालने के मामलों पर सख्ती बढ़ गई है। ऐसे में एक भारतीय बैंक के साथ ऑस्ट्रेलिया में हुई घटना खासी सुर्खियां बटोर रही है। आईसीआईसीआई बैंक (ICICI Bank) ने 2010 से कई किस्तों में लैंको ग्रुप (Lanco Group) को 85 करोड़ डॉलर (आज के डॉलर प्राइस पर 6,919 करोड़ रुपये) का लोन दिया था। उस समय चंदा कोचर (Chanda Kochhar) ही बैंक की अगुआई कर रही थीं। हालांकि, 2017 में यह कर्ज बैड लोन में तब्दील हो गया। यह फंड लैंको को वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में ग्रिफिन कोल माइन खरीदने के लिए उधार दिया गया था।

    ऑस्ट्रेलिया मीडिया की नवंबर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तब से लेंडर्स घाटे में चल रही इस मान की प्रभावी ओनरशिप को लेकर ही जूझ रहे हैं और कथित रूप से नियंत्रण को लेकर चुप हैं।

    Griffin माइन वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया में ब्लूवाटर्स पावर स्टेशन को कोयले की आपूर्ति करती है। उसकी वेबसाइट के मुताबिक, ब्लूवाटर्स पर जापान की बिजली कंपनी कंसाई इलेक्ट्रिक और ग्लोबल ट्रेडिंग कंपनी सुमितोमो कॉर्प का मालिकाना हक है।


    इन बैंकों ने भी दिया लोन

    घटनाक्रम की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने कहा बैंक ऑफ बड़ौदा, इंडियन ओवरसीज बैंक और एक्जिम बैंक सहित बैंकों के कंसोर्टियम ने इसके लिए लगभग 1.4 अरब डॉलर (मौजूदा प्राइस पर लगभग 11,396 करोड़ रुपये) का कर्ज दिया था। उनमें से, ICICI Bank का कर्ज खासा ज्यादा है।

    ऑस्ट्रेलियाई मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रिफिन को खरीदने के लिए लैंकों को ICICI Bank द्वारा दिया गया लोन 1.1 अरब डॉलर (मौजूदा प्राइस पर 8,954 करोड़ रुपये) है, जो शुरुआत में 75 करोड़ डॉलर था। एक सूत्र के मुताबिक, यह लोन 2017 में एनपीए बन गया है।

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    इस संबंध में ICICI Bank, Bank of Baroda, Indian Overseas Bank और Exim Bank को भेजे गए ईमेल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। वहीं, आरबीआई को भी मेल भेजकर पूछा गया कि रेगुलेटर ने इस मामले पर गौर किया तो इस पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

    डील में कैसे फंसे ICICI Bank और दूसरे लेंडर्स

    वास्तव में ICICI Bank ऐसा अकेला बैंक नहीं है, जिसने 2010 के बाद ऐसे जोखिम भरे कॉर्पोरेट लोन दिए थे। उस समय ज्यादातर भारतीय बैंक ग्लोबल एनर्जी सेक्टर पर दांव लगाने को उत्साहित थे।

    इसके अलावा, आईसीआईसीआई बैंक ने लैंको को कर्ज उस समय दिया, जब बैंक ने अपनी पूर्व प्रमुख कोचर के अधीन वीडियोकॉन समूह पर 3,250 करोड़ रुपये का बेहद जोखिम भरा दांव लगाया था। बाद की जांचों के मुताबिक, यह लोन कथित रूप से कोचर फैमिली और वीडियोकॉन के Venugopal Dhoot के बीच ‘लेनदेन’ वाली डील थी।

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    2018 में बढ़ गईं लैंकों की मुश्किलें

    ICICI Bank ने लैंको को ऑस्ट्रेलियाई कोल माइन बिजनेस में किस्मत आजमाने के लिए लोन दिया। हालांकि, खरीदार और फाइनेंशर्स दोनों के लिए यह दांव गलत साबित हुआ। कोयले का उत्पादन खासा कम रहा और लैंको भारी कर्ज में आ गई। आखिरकार दिवालिया हो गई।

    अगस्त, 2018 में लैंको की मुश्किलें तब और बढ़ गईं, जब भारतीय बैंकरप्सी कोर्ट ने ग्रुप की होल्डिंग कंपनी लैंको इंफ्राटेक के लिक्विडेशन का आदेश दे दिया। एनालिस्ट्स ने कहा, लैंको ने ग्रिफिन के लिए खासी ऊंची कीमत चुकाई, जो बेहद खराब क्वालिटी का कोयला निकालती थी। यह कोयला निर्यात के लायक नहीं था। इससे ICICI Bank की लोन देने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए।

    पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर 2017 में लैंको के अधिकारियों ने कहा कि गिरवी शेयरों को लेने के कारण ग्रिफिन कोल अब ग्रुप की सब्सिडियरी नहीं रही।

    अब सवाल उठता है कि क्या इस फेल हो चुकी माइन के मालिक ICICI Bank और दूसरे लेंडर हैं। ऑस्ट्रेलिया की एबीसी न्यूज के मुताबिक, चूंकि लैंको बैंकरप्ट हो गई है इसलिए प्रभावी रूप से लेंडर्स के पास ग्रिफिन की ओनरशिप है। रिपोर्ट से पता चलता है कि लेंडर्स अब कोयले की कीमतें बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं, जिसका असर वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के कंज्यूमर्स पर पड़ेगा। खबरों के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया के अधिकारी इस मसले पर लेंडर्स के साथ बातचीत कर रहे हैं।

    एक सूत्र ने कहा कि बैंक के पास ओनरशिप नहीं है। ब्लूवाटर्स पावर चाहती है कि बैंक ओनरशिप ले ले। मनीकंट्रोल इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं कर सका है।

    क्या ग्रिफिन से बैंक को मिलेगा पैसा

    बैंक को उम्मीद है कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार के ग्रिफिन कोल माइन के पुनरुद्धार के प्रयासों से कैशफ्लो में सुधार में मदद मिलेगी। एक सूत्र ने कहा, अगर कोई पैसा वापस आता है तो बैंक को खुशी होगी।

    हालांकि, एबीसी न्यूज के मुताबिक, ग्रिफिन की माइनिंग लीज जुलाई में खत्म हो जाएगी और ऑस्ट्रेलिया सरकार ओनर की वित्तीय क्षमता पर गौर करेगी। यह लेंडर्स के लिए एक अन्य चुनौती है।

    2010 के बाद भारतीय बैंकों की गलतियों जुड़ा यह एक ही मामला है। भारत की शिड्यूल्ड कमर्शियल बैंक पिछले पांच साल के दौरान 10 लाख करोड़ रुपये के लोन बट्टे खाते में डाल चुके हैं।

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