पिछले 2 दशकों से, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आईपीओ मार्केट (IPO Market) में कमजोरी का ट्रेंड रहा है। हालांकि इस बार यह ट्रेंड बदलता दिख रहा है। ऐसा लगता है कि निवेशक और बाजार यह मानकर चल रहे हैं कि चुनाव के बाद नीतियों के स्तर पर कोई अहम बदलान नहीं आने वाला है। IPO के जरिए इस दिसंबर और मार्च तिमाही के दौरान रिकॉर्ड पैसे जुटाए गए हैं। प्राइम डेटाबेस के एक आंकड़े से पता चलता है कि अक्टूबर से फरवरी की अवधि में 39 कंपनियों ने अपने IPO से करीब 33,253.07 करोड़ रुपये जुटाए।
अगर इसकी तुलना, 2004, 2009, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले के 6 महीने की अवधि से करें, तो इस दौरान कुल 20 कंपनियों के IPOs आए थे, जिन्होंने 4,308 करोड़ रुपये जुटाए। इसका मतलब है कि मौजूदा लोकसभा चुनाव से पहले की 6 महीने की अवधि में जितनी राशि जुटाई गई है, उतना पिछले 4 चुनावों के दौरान जुटाई गई कुल राशि का करीब 7 गुना है।
प्राइम डेटाबेस ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर, प्रणव हल्दिया ने कहा, "अप्रैल और मई में और भी कई इश्यू लॉन्च होने की उम्मीद है।" एक्सपर्ट्स ने कहा कि निवेशकों और कंपनियों के बीच इस साल चुनाव के नतीजों को लेकर अनिश्चितता कम है। इससे प्राइमरी और सेकेंडरी दोनों बाजारों में मजबूत पॉजिटिव सेंटीमेंट बना हुआ है।
मार्च में भी IPO मार्केट गुलजार बना हुआ है। अब तक 4 कंपनियों के करीब 1,548.75 करोड़ रुपये के आईपीओ बाजार में चुके हैं। वहीं पॉपुलर व्हीकल्स एंड सर्विसेज और क्रिस्टल इंटीग्रेटेड सर्विसेज का क्रमश: 601.5 करोड़ रुपये और 300 करोड़ रुपये का आईपीओ इस समय सब्सक्रिप्शन के लिए खुला हुआ है।
भारत में आम चुनाव आमतौर पर अप्रैल और मई के बीच होते हैं। इस साल के आम चुनाव की तारीखों का ऐलान अभी नहीं हुआ है। हल्दिया के अनुसार, पिछले चुनावों के नतीजों पर कुछ अनिश्चितताएं थीं। उन्होंने कहा कि प्राइमरी मार्केट पर चुनाव नतीजों, भू-राजनीति संकट या महंगाई के कारण आए अनिश्चितता और अस्थिरता का असर पड़ता है।" उन्होंने कहा, ''अस्थिरता के दौर में प्राइमरी मार्केट में गतिविधियां लगभग बंद हो जाती हैं।''