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जेल जैसे हालात में हैं ब्रिटेन से डिपोर्ट होने वाले माइग्रेंट्स, शॉकिंग है उनके साथ हुआ व्यवहार

ब्रिटिश सरकार ने एक कानून पारित किया है, जिसमें छोटी नाव वाले से आने वाले माइग्रेंट्स को हिरासत में लेने और फिर स्थायी रूप से उनके गृह राष्ट्र या अन्य देशों में डिपोर्ट करने की बात कही गई है। बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री में ब्रुक हाउस में बंदियों के प्रति कथित दुर्व्यवहार के गुप्त फुटेज प्रसारित होने के दो साल बाद, साल 2019 में जांच शुरू की गई थी

Edited By: Moneycontrol Newsअपडेटेड Sep 20, 2023 पर 7:55 AM
जेल जैसे हालात में हैं ब्रिटेन से डिपोर्ट होने वाले माइग्रेंट्स, शॉकिंग है उनके साथ हुआ व्यवहार
ब्रिटिश सरकार ने इस मामले में सुधार के लिए पिछली कॉल्स को नजरअंदाज कर दिया था।

ब्रिटेन में डिपोर्टेशन का इंतजार कर रहे माइग्रेंट्स को ब्रिटिश सरकार (UK Government) की ओर से संचालित डिटेंशन सेंटर में शारीरिक और मौखिक दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा। यह बात एक ब्रिटिश जांच से सामने आई है। जांच की रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी को भी 28 दिनों से अधिक समय तक ऐसी जेल जैसी स्थिति में न रखा जाए। जांच की चेयरवुमन केट ईव्स का कहना है कि लंदन के दक्षिण में गैटविक एयरपोर्ट के पास ब्रुक हाउस इमीग्रेशन रिमूवल सेंटर में माइग्रेंट्स को "शॉकिंग ट्रीटमेंट" सहना पड़ा। फैसिलिटी में स्टाफ का व्यवहार टॉक्सिक है और माइग्रेंट्स को नस्लवादी व अपमानजनक भाषा, अमानवीय टिप्पणियों और बल के अनुचित इस्तेमाल का सामना करना पड़ा। उनकी रिपोर्ट में कहा गया है कि इन घटनाओं में सबसे गंभीर घटना हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति की गर्दन पर दबाव डालना रही।

सरकार ने इस मामले में सुधार के लिए पिछली कॉल्स को नजरअंदाज कर दिया था। इसलिए ईव्स ने अधिकारियों से उनकी सिफारिशों, विशेष रूप से 28-दिन की महत्वपूर्ण ​हिरासत अवधि पर ध्यान देने की अपील की है। बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री में ब्रुक हाउस में बंदियों के प्रति कथित दुर्व्यवहार के गुप्त फुटेज प्रसारित होने के दो साल बाद, साल 2019 में जांच शुरू की गई थी।

ब्रि​टिश सरकार का नया नियम

बता दें कि ब्रिटिश सरकार ने इंग्लिश चैनल से छोटी नावों जैसे अनाधिकृत माध्यमों से ब्रिटेन आने वाले लोगों के प्रति तेजी से दंडात्मक दृष्टिकोण अपनाया है। सरकार ने एक कानून पारित किया है, जिसमें छोटी नाव वाले से आने वाले माइग्रेंट्स को हिरासत में लेने और फिर स्थायी रूप से उनके गृह राष्ट्र या अन्य देशों में डिपोर्ट करने की बात कही गई है। इस मामले में एकमात्र तीसरा देश रवांडा है, जो ऐसे माइग्रेंट्स को अपने यहां लेने के लिए सहमत हुआ है।

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