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Rangbhari Ekadashi 2026: रंगभरी एकादशी आज, केरलम और गुजराती परिधानों में आज सजेगा शिव-गौरा का दिव्य रूप

Rangbhari Ekadashi 2026: फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी आज है, जिसे रंगभरी और आमलकी एकादशी के नाम से भी जाता है। आज वाराणसी में केरलम और गुजराती परिधानों में बाबा काशी विश्वनाथ और गौरा माता का दिव्य रूप देखने को मिलेगा। आइए जानें क्या है इसका महत्व

MoneyControl Newsअपडेटेड Feb 27, 2026 पर 12:08 PM
Rangbhari Ekadashi 2026: रंगभरी एकादशी आज, केरलम और गुजराती परिधानों में आज सजेगा शिव-गौरा का दिव्य रूप
फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है।

Rangbhari Ekadashi 2026: आज फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का व्रत किया जा रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आज के दिन देवाधिदेव भगवान शिव माता पार्वती से शादी के बाद गौना के बाद पहली बार अपनी प्रिय नगरी काशी पहुंचे थे। यहां भक्तों ने अबीर-गुलाल उड़ा कर धूमधाम से उनका स्वागत किया था। इसलिए फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है। आज के दिन में शिव भक्त अबीर-गुलाल उड़ाते हुए शिव-गौरा की दिव्य झांकी निकालते हैं। इस साल शिव-गौरा केरलम और गुजराती परिधानों और भी दिव्य नजर आएंगे। काशी की नगरी आज भारत की सांस्कृति विविधता, प्राचीन परंपरा और इतिहास की एक बार फिर साक्षी बनेगी।

रंगभरी एकादशी पर होने वाले शिव–गौरा के गौना महोत्सव में इस बार शताब्दियों पुरानी परंपराओं के बीच पहली बार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमा को गुजरात, राजस्थान और केरलम के पारंपरिक परिधानों से सजाया जाएगा। काशी में जब शिव–गौरा नगर भ्रमण पर निकलेंगे तब उसमें उत्तर, दक्षिण और पश्चिम भारत की सांस्कृतिक झलक दिखाई देगी। महंत वाचस्पति तिवारी ने बताया कि इस वर्ष बाबा और गौरा के परिधान विशेष रूप से अहमदाबाद, जोधपुर और तिरुवनंतपुरम से मंगाए गए हैं। यह केवल परिधान परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय का सशक्त संदेश है।

इस बार बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को गुजराती और केरल के पारंपरिक पुरुष परिधान में सजाया जाएगा। इनमें गुजराती शैली का अंगरखु, काठियावाड़ी कुर्ता और केरल की पारंपरिक वेष्टि/धोती (मुंडू) शामिल हैं। वहीं, माता गौरा को नववधू के रूप में विशेष रूप से अलंकृत किया जाएगा। माता गौरा के श्रृंगार में गुजराती बंधानी/पटोला और दक्षिण भारत की प्रसिद्ध कांजीवरम साड़ी शामिल होगी। पारंपरिक आभूषणों में नथनी, गला-नु हार, कान-नी-बुट्टी, बाजूबंद और कमरबंद शामिल हैं। देश के विभिन्न प्रांतों से आए इन परिधानों को काशी के कलाकारों ने अंतिम स्वरूप दिया है।

पहली बार आज गले मिलेंगे काशी और मथुरा

आज रंगभरी एकादशी के पर पहली बार, हिंदू भक्ति के दो खास केंद्र काशी और मथुरा एक-दूसरे संग होली मनाएंगे और गले मिलेंगे। काशी विश्वनाथ मंदिर (KVT) से रंग और गुलाल के साथ गिफ्ट से भरी गाड़ी बुधवार को श्री कृष्ण जन्मभूमि पहुंची, जिसमें लड्डू गोपाल के लिए रंग, गुलाल, कपड़े, फल, फूल, खिलौने, चॉकलेट और मिठाइयां थीं। वहीं, श्री कृष्ण जन्मस्थान मंदिर के लोक कलाकारों की एक टोली शुक्रवार को काशी विश्वनाथ मंदिर में ‘रास’ और फूलों की होली खेलेगी। होली से कुछ दिन पहले मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी, देवी पार्वती से शादी के बाद भगवान शिव के काशी लौटने की खुशी में मनाई जाती है। रंगभरी एकादशी शैव और वैष्णव परंपराओं का एक अनोखा मेल है।

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