नए रूल्स के मुताबिक, भारत में एंट्री करने वाली चाय की प्रत्येक खेप (कंसाइनमेंट) की कड़ी लैब टेस्टिंग अनिवार्य कर दी गई थी, ताकि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नियमों का पालन हो सके। पहले यह काम सामान्य प्रक्रियाओं और पार्शियल सैंपल टेस्टिंग से हो जाता था। नए नियम के तहत हर सैंपल की टेस्टिंग के लिए व्यापारियों को ज्यादा पैसे का भुगतान करना था। इससे एक्सपोर्ट की कॉस्ट बढ़ रही थी। चाय का सैंपल लेने के बाद, फाइनल रिपोर्ट आने तक चाय को एक निर्धारित गोदाम में रखना जरूरी था। इस प्रोसेस में 15 से 20 दिन का समय लग सकता था। इस दौरान व्यापारी न तो चाय बेच सकते थे और न ही उसे कहीं और भेज सकते थे। अगर टेस्ट फेल हो जाता तो आयातक को 15000 रुपये और जीएसटी देकर दोबारा टेस्ट कराने की रिक्वेस्ट करनी होती। अगर दूसरा टेस्ट भी फेल हो जाता, तो पूरी चाय को नष्ट करना पड़ता या वापस नेपाल भेजना पड़ता।