पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतुआ समुदाय को लेकर सियासत तेज होती जा रही है। ठाकुरबाड़ी में हुई झड़प और SIR में मतुआ मतदाताओं के नाम कटने की आशंका के बीच अब ममता ठाकुर के मतुआ महासंघ ने आंदोलन करने का ऐलान कर दिया है।

पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मतुआ समुदाय को लेकर सियासत तेज होती जा रही है। ठाकुरबाड़ी में हुई झड़प और SIR में मतुआ मतदाताओं के नाम कटने की आशंका के बीच अब ममता ठाकुर के मतुआ महासंघ ने आंदोलन करने का ऐलान कर दिया है।
अखिल भारतीय मतुआ महासंघ की ओर से 5 जनवरी 2026 को दोपहर 12 बजे पूरे पश्चिम बंगाल में नाकाबंदी का आह्वान किया गया है। यह नाकाबंदी ठाकुरबाड़ी में मतुआ समर्थकों पर हुए कथित हमले और SIR प्रक्रिया के दौरान मतुआ समुदाय के वोट बाहर किए जाने के विरोध में की जा रही है।
रविवार (28 दिसंबर) को ठाकुरनगर स्थित ठाकुरबाड़ी में अखिल भारतीय मतुआ महासंघ की एक अहम बैठक हुई। बैठक के बाद महासंघ के महासचिव सुकेश चौधरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नाकाबंदी की घोषणा की। उन्होंने कहा कि अगर मतुआ समुदाय के लोकतांत्रिक अधिकारों से खिलवाड़ किया गया, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
दरअसल, विवाद की जड़ केंद्रीय राज्य मंत्री शांतनु ठाकुर का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि, "अगर एक लाख मतुआ वोट नहीं दे पाते और उससे 50 लाख घुसपैठियों को रोका जा सके, तो हमें इसे स्वीकार करना होगा।"
इस बयान के बाद राज्य में हलचल मच गई। और मतुआ समुदाय के एक बड़े हिस्से में नाराज़गी फैल गई। शुक्रवार को ठाकुरबाड़ी में इसी बयान के विरोध में प्रदर्शन हुआ, जो बाद में हिंसक झड़प में बदल गया। आरोप है कि ममता बाला ठाकुर के एक समर्थक को जमीन पर गिराकर पीटा गया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आई।
ममता बाला ठाकुर के समर्थकों का आरोप है कि शांतनु ठाकुर के समर्थकों ने प्रदर्शनकारियों पर हमला किया। वहीं शांतनु ठाकुर के समर्थकों का दावा है कि ममता बाला ठाकुर के समर्थक हथियार के साथ हमला करने उनके घर आए थे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद मतुआ राजनीति दो धड़ों में साफ बंटी हुई नजर आ रही है।
शांतनु ठाकुर समर्थित अखिल भारतीय मतुआ महासंघ के महासचिव सुखेंद्रनाथ गैन ने ममता बाला ठाकुर गुट के नाकाबंदी कार्यक्रम पर सवाल उठाते हुए कहा, "वे इसलिए आंदोलन कर रहे हैं क्योंकि मतुआ समाज अब उनके साथ नहीं है।"
बता दे कि मतुआ वोट बैंक बंगाल की राजनीति में बेहद निर्णायक भूमिका निभाता है, खासकर उत्तर 24 परगना, नदिया और सीमावर्ती इलाकों में। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले मतुआ समुदाय का असंतोष तृणमूल और भाजपा दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
SIR, नागरिकता और वोटिंग अधिकार को लेकर फैली असमंजस की स्थिति ने मतुआ समाज को और अधिक सतर्क कर दिया है। 5 जनवरी की नाकाबंदी को लेकर प्रशासन भी अलर्ट पर है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन किस दिशा में जाएगा, यह बंगाल की चुनावी राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है।
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