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अगले एक साल तक महंगाई से राहत मिलने की उम्मीद नहीं, जानिए क्या है मुश्किल

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है सरकार और RBI एक मुश्किल संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी कोशिश यही होगी कि ब्याज दरों में छोटी अवधि के भीतर तेजी से वृद्धि कर जल्दी से जल्दी महंगाई को काबू करने की कोशिश की जाए। ताकि ग्रोथ को एक बार फिर तेज करने के लिए सरकार के पास कम से कम एक साल का समय हो

MoneyControl Newsअपडेटेड Jun 28, 2022 पर 7:26 AM
अगले एक साल तक महंगाई से राहत मिलने की उम्मीद नहीं, जानिए क्या है मुश्किल
केंद्रीय बैंक की सबसे प्रमुख भूमिका ही महंगाई दर को नियंत्रित रखना है

भुवन भास्कर

महंगाई की बात सुनते ही सबसे पहले ध्यान आता है मध्य वर्ग का, जिसके किचेन का बजट दाल-चावल और सब्जियों की बढ़ती कीमतों के कारण बिगड़ने लगता है। लेकिन यह महंगाई का सबसे सरल स्वरूप है। इसलिए कि किचेन के बजट को खाने-पीने की आदतों को बदलकर नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन महंगाई दर का जटिल स्वरूप भी है। यह स्वरूप कुछ-कुछ डायबिटीज की बीमारी की तरह है, जो अर्थव्यवस्था के अनेक अंगों पर इस तरह असर डालता है कि अर्थव्यवस्था अंदर ही अंदर खोखली और कमजोर होने लगती है। इसीलिए दुनिया का कोई भी केंद्रीय बैंक महंगाई दर को बहुत समय तक ऊपरी स्तरों पर बने रहने देने का जोखिम नहीं ले सकता।

दरअसल देशों में केंद्रीय बैंक की सबसे प्रमुख भूमिका ही महंगाई दर को नियंत्रित रखना है। लेकिन महंगाई दर को नियंत्रित रखने के जो भी टूल्स केंद्रीय बैंक के पास हैं, उनका ग्रोथ से उलटा संबंध है। यानी महंगाई दर को नियंत्रित रखने के लिए सरकार और केंद्रीय बैंक को ग्रोथ की कुर्बानी देनी ही पड़ती है। इसलिए महंगाई दर को एक सीमा तक बर्दाश्त किया जाता है ताकि ग्रोथ पर असर न पड़े। इस सीमा को ही केंद्रीय बैंक का कंफर्ट लेवल कहते हैं।

भारत के संदर्भ में बात करें तो रिजर्व बैंक (RBI) ने खुदरा महंगाई दर की अपनी बर्दाश्त सीमा 6% तय की थी, जो इस पिछले 12 महीनों में 6 बार टूट चुकी है। मार्च 2022 में थोक महंगाई दर 14.5% का स्तर पार कर गई जो कि 2012 के बाद से उच्चतम स्तर है और इसी महीने में खुदरा महंगाई दर भी अक्टूबर 2020 के बाद के उच्चतम स्तर 6.95% पर पहुंच गई।

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