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Ganesh Chaturthi 2023: महाराष्ट्र में गणपति उत्सव की शुरुआत कब हुई? जानिए पूरा इतिहास

Ganesh Chaturthi 2023: गणपति को समर्पित गणेश चतुर्थी का त्योहार गांव से लेकर छोटे-बड़े सभी शहरों में मनाया जाता है। इस दिन लोग भगवान गणेश की स्थापना करके उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कहा जाता है कि महाराष्ट्र में गणेश उत्सव की शुरुआत सन 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने थी। उस दौर में देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी

Jitendra Singhअपडेटेड Sep 05, 2023 पर 12:14 PM
Ganesh Chaturthi 2023: महाराष्ट्र में गणपति उत्सव की शुरुआत कब हुई? जानिए पूरा इतिहास
Ganesh Chaturthi 2023: इस साल गणेश चतुर्थी की शुरुआत 19 सितंबर से होगी। इसका समापन अनंत चतुर्दशी के दिन 28 सितंबर को होगा।

Ganesh Chaturthi 2023: गणेश चतुर्थी का त्योहार हर साल बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर से लेकर घरों और मोहल्लों में गजानन विराजमान किए जाते हैं। गणेश चतुर्थी पर पूरा माहौल गणपति की भक्ति में डूब जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी की शुरुआत 19 सितंबर से होगी। इसका समापन अनंत चतुर्दशी के दिन 28 सितंबर को होगा। गणेश उत्सव को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गणपति उत्सव की शुरुआत कैसी हुई। सबसे पहले किसने गणेशोत्सव की शुरुआत की और इसके पीछे क्या कारण था। जानते हैं गणेश उत्सव के इतिहास के बारे में जानते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि गणेश उत्सव की शुरुआत 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में की थी। उस वक्त देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी। ऐसे में तिलक ने गणेश उत्सव के नाम पर लोगों में एकता और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करने के मकसद से गणेश उत्सव मनाते थे।

गणेशोत्सव का इतिहास

दरअसल, 1892 में अंग्रेज एक नियम के तहत भारतीयों को एक जगह इकट्ठा नहीं होने देते थे। तिलक ने सोचा कि इस त्योहार के जरिए भारतीयों को एक जगह इकट्ठा किया जा सकता है और इसके जरिए उनमें संस्कृति के प्रति सम्मान और राष्ट्रवाद की भावना जगाई जा सकती है। इसके बाद लोक मान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में केशवजी नाइक चॉल सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की नींव रखी। इस मंडल (समिति-कमेटी) की कोशिशों से ही पहली बार विशाल गणपति प्रतिमा के साथ गणेश उत्सव मनाया जाने लगा। स उत्सव के मंच से तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। मराठी लोकगीत पोवाडे के सुर में देश से लगाव की कथा गाई जाने लगी। देशप्रेम के भाषण होने लगे। इन्हें सुनने के लिए हर साल झुंड के झुंड लोग गणेश उत्सव के मैदान में पहुंचने लगे।

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