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रुपए की कमजोरी में छिपा है इसकी तंदुरुस्ती का राज

रुपये के कमजोर होने से जहां एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों को फायदा होगा, वहीं इम्पोर्ट करने वाली कंपनियों को नुकसान होगा। क्योंकि अमेरिका, चीन जैसे अपने मुख्य व्यापारिक साझेदारों के साथ भारत के व्यापार में आयात ज्यादा और निर्यात कम है, तो कमजोर रुपए से व्यापार घाटा बढ़ता जाएगा

MoneyControl Newsअपडेटेड Sep 12, 2022 पर 4:24 PM
रुपए की कमजोरी में छिपा है इसकी तंदुरुस्ती का राज
अभूतपूर्व गिरावट के बावजूद भारतीय इकनॉमी की चमकदार तस्वीर दिखा रहा है रुपया

भुवन भास्कर

भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 80.11 का अपना सबसे निचला स्तर छूने के बाद फिलहाल लगभग 50 पैसे मजबूत होकर एक दायरे में स्थिर होता दिख रहा है। लेकिन यह मान लेना कि रुपये के लिए सबसे बुरा दौर खत्म हो गया है, थोड़ी जल्दबाजी होगी। वैसे तो एक देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा के मुकाबले मजबूत या कमजोर होना विशुद्ध तौर पर आर्थिक घटना है, लेकिन राजनीतिक शोशेबाजी और जुमलों के दौर में अक्सर रुपये की कमजोरी को राष्ट्रीय स्वाभिमान पर प्रहार के रूप में भी उछाल दिया जाता है और इसलिए कई बार रुपये का कमजोर होना सत्तारूढ़ दल के लिए आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक चिंता का सबब बन जाता है।

रुपया यदि डॉलर के मुकाबले मजबूत हो रहा है, तो उसके क्या मायने हैं या फिर कमजोर हो रहा है, उसका क्या मतलब है? चीन दशकों से अपनी मुद्रा युआन को कृत्रिम रूप से कमजोर रख कर अमेरिका के खिलाफ भुगतान संतुलन को अपने पक्ष में रखने में कामयाब रहा है। इसको समझने की आवश्यकता है। जब किसी देश की मुद्रा कमजोर होती है तो इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसके उत्पाद ज्यादा प्रतिस्पर्द्धी भाव पर उपलब्ध होते हैं।

इसके उलट यदि कोई मुद्रा डॉलर के मुकाबले मजबूत हो रही है, तो उसका आयात सस्ता होगा और निर्यात महंगा होगा। जाहिर है कि भुगतान संतुलन के मामले में इसके कारण मजबूत मुद्रा वाला देश हमेशा नुकसान में रहेगा।

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