दिग्गज कारोबारी औ टाटा संस के चेयरमैन एमेरिटस रतन टाटा का बुधवार की देर रात 86 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने न सिर्फ कारोबारी जगत में साहसिक फैसले लिए बल्कि अपनी निजी जिंदगी में काफी बहादुरी दिखाई थी। ऐसा की एक वाकया करीब 16 साल पहले 26 नवंबर को मुंबई के ताज होटल पर पाकिस्तानी हमले का है। उस दौरान रतन टाटा ने काफी साहस दिखाया था। उस समय वह 70 वर्ष के थे और वह होटल के कोलाबा छोर पर खड़े दिखे थे। हालांकि ताज होटल में जाने के लिए वह अपनी कार से निकले थे लेकिन उन्हें गोलाबारी की वजह से अंदर नहीं घुसने नहीं दिया गया था।
ताज हमले से प्रभावित लोगों के लिए रतन टाटा ने किए बड़े काम
नवंबर 2008 में मुंबई में छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, ओबेरॉय ट्राइडेंट और ताज पैलेस एंड टॉवर समेत कई स्थानों पर गोलाबारी हुई थी। हमले के आखिरी दिन यानी 29 नवंबर 2008 को नेशनल सिक्योरिटी गार्ड्स ने ताज होटल से आतंकियों को निकालने के लिए ऑपरेशन टॉरनेडो चलाया था। इस हमले में 166 की जान गई थी जिसमें होटल के 11 लोग भी थे। हमले के बाद टाटा ने होटल को फिर से खोलने और हमले में मारे गए या घायल लोगों के परिवारों का ध्यान रखने की कसम खाई थी। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने मारे गए लोगों के रिश्तेदारों को उनके जीवन भर की कमाई का वेतन दिया। टाटा ग्रुप ने आपदाओं के दौरान लोगों की सहायता के लिए ताज पब्लिक सर्विस वेलफेयर ट्रस्ट (TPSWT) का भी गठन किया था। हमले के एक वर्ष बाद, 2009 में टाटा ने होटल में उन 31 कर्मचारियों और मेहमानों की याद में एक स्मारक बनाआ, जिनकी ताज में मौत हुई थी।
पहली बार बंद हुआ था ताज होटल
ताज होटल को वर्ष 1903 में जमशेदजी टाटा ने शुरू किया था। इसके दरवाजे कभी नहीं बंद हुए थे, यहां तक कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी, जब यह अस्थायी तौर पर एक अस्पताल के रूप में कार्य करता था। हमले के दौरान यह पहली बार था जब इसे बंद करना पड़ा था। करीब चार साल पहले वर्ष 2020 में रतन टाटा ने मुंबई पर आतंकी हमलों को याद कर कहा था कि 12 साल पहले हुई बर्बरता को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। एक इंस्टाग्राम पोस्ट में उन्होंने उस दिन मुंबई के लोगों की प्रशंसा की जब उन्होंने सभी मतभेदों को भुलाकर एकजुट होकर आतंकवाद और विनाश का सामना किया।